-गंभीर रूप से बीमार पति को लेकर लखनऊ से घर लौट रही महिला से एंबुलेंस में दुष्कर्म की कोशिश का मामला
- दरिंदगी के बाद पति की मौत की घटना को लेकर सदमे से बाहर नहीं निकल पा रही है पीड़िता
संवाद न्यूज एजेंसी
सकारपार। बीते 29 अगस्त को लखनऊ से पति की इलाज करवा कर घर लौट रही बांसी कोतवाली क्षेत्र की महिला के साथ चलती एंबुलेंस में दुष्कर्म की कोशिश के बाद पीड़िता के पति की मौत हो गई थी। जिसके बाद से वह सदमे में रही है, जिससे उसकी तबीयत बिगड़ जा रही है। अकेले रहने से होने वाली परेशानी को देखकर भाई मायके लेकर चला गया है।
बता दें कि घटना के 35 दिन बीत जाने के बाद भी पीड़िता अभी सदमे से बाहर नहीं निकल पा रही है। पीड़िता अक्सर चलती एंबुलेंस में हुए घटनाक्रम के बारे मे सोचने के साथ पति की मौत के बारे में भी सोचती रहती है। यही कारण है कि पीड़िता की तबीयत अक्सर बिगड़ती रहती है। घर पर कई बार पीड़िता की तबीयत अचानक खराब हो जाती थी। तो परिवार के लोग तत्काल पीड़िता को लेकर प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र पहुंचते थे। जहां इलाज के बाद पीड़िता को आराम महसूस होने पर घर भेज दिया जाता था। जिसको लेकर चिकित्सकों ने पीड़िता को माधव प्रसाद त्रिपाठी मेडिकल कॉलेज में इलाज कराने के लिए सलाह दी थी। घर पर तबीयत बराबर खराब रहने के कारण चार दिन पहले पीड़िता अपने भाई के साथ मायके चली गई। पीड़िता के मायके से माधव प्रसाद त्रिपाठी मेडिकल कॉलेज नजदीक पड़ता है। जिससे पीड़िता को वहा इलाज करवाने के लिए आसान पढ़ रहा था ।
पीड़िता ने बताई अपनी आप बीती
पीड़िता ने बताया कि पति के ब्रह्मभोज तक घर परिवार से भरा पूरा था। घर पर काफी लोगों के रहने से मन उन्हीं लोगों में बटा रहता था। मन में अनर्गल की बातें नहीं आती थी। लेकिन ब्रह्मभोज के बाद घर पूरी तरह से खाली हो गया। जिससे मैं अपने आप को अकेलापन महसूस करने लगी। यही सब सोचकर तबीयत भी अक्सर बिगड़ी रहती थी। ससुराल में घर से बाहर भी नहीं निकलती थी। घर में अकेले बैठे रहने से हर वक्त उस काली रात की घटनाक्रम दिमाग में गूंजती रहती थी। जिसे सोचकर मन बेचैन होने के साथ घबराहट सी होने लगती है। पीड़िता ने बताया कि दुख की घड़ी में तत्काल जनप्रतिनिधियों के पहुंचने से कुछ आर्थिक सहयोग मिल गया था। जिससे पति के इलाज के दौरान लिया गया कर्ज चुकाने में कुछ आसानी हुई। लेकिन अब अबोध बच्चों के साथ परिवार की परवरिश के लिए सरकार की तरफ से कोई आर्थिक मदद या ठोस सहायता की आस नहीं दिखाई दे रही है। जिससे परिवार का भरण पोषण आसानी से हो जाए