रमजान का महीना सभी महीनों से अफजल माना जाता है। इस महीने को बरकत का महीना कहा जाता है। मौलाना रियाजुल हक कासमी ने बताया कि रमजान को तीन अशरे में बांटा गया है। पहला अशरा रहमत का दूसरा अशरा मगफिरत का और तीसरा अशरा जहन्नुम से निजात का होता है। रोजेदारों के लिए रमजान मुबारक महीना अब रहमत से आगे अब दूसरे अशरे में प्रवेश कर गया है। इसे मगफिरत का अशरा कहते हैं मौलाना हक ने बताया की इस असरे में अललाह ताला जो भी गुनहगार बंदे अपने गुनाहों में डूबे हैं और जानते हैं की उन्हें अपने गुनाहों की माफी नहीं मिलेगी और ना उम्मीद हो जाते हैं तो इस अशरे में अल्लाह तबारक ताला उन रोजेदार बंदों को भी माफ कर देता है जो सच्चे दिल से अपने गुनाहों से तौबा कर लेता है। उन्होंने बताया कि मनुष्य अपने बुरे कर्मों का पश्चाताप सच्चे मन से कर ले तो खुदा उसे अपनी रहमत और कुदरत से उसे माफ कर देता है। रमजान के इस असरे में तमाम रोजेदार दिन भर भूखे प्यासे रहने के बाद अपनी बुराइयों से छुटकारा पाने के लिए मस्जिदों में खुद के सामने अपने सिर को झुका कर अपनी गलतियों की माफी मांगते हैं। खुदा ऐसे बंदों पर बहुत खुश होता है। इस महीने में नर्क के दरवाजे बंद कर दिए जाते है और स्वर्ग का दरवाजा खोल दिया जाता है। इस महीने के बराबर कोई दूसरा महीना हो ही नहीं सकता है। उन्होंने बताया की रमजान के महीने में दिन भर रोजा रखने वाले बंदों पर खुदा का विशेष क्रम रहता है। दिन भर रोजेदार भूखे प्यासे दुनिया की हर बुराइयों से अपने आप को बचाने के बाद शाम को दिन डूबने का इंतजार करता है और शाम होते ही रोजेदार अपने अपने घरों से बाजारों की तरफ अफ्तारी के इंतेजाम के लिए निकल पड़ते हैं। रोजेदारों के चौराहों और बाजारों में पहुंचने के बाद जो खरीदारी का नजार होता है वह बहुत सुहाना लगता है। रोजेदार एक दुकान से दूसरे दुकान पर खुशी खुशी अफ्तारी का सामान खरीदते हैं। इस तरह का ये नजरा पौली चौराहे पर फलों से सजी दुकान पर रोजेदारों की भीड़ खुद बयान कर रही है।