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तीन तलाक पर महिलाएं नरम

Fri, 29 Dec 2017 01:53 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला संभल
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triple talaq
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‘लफ्जे तलाक सोचिये, किस-किस की हार है। सुनते हैं आसमान में बनती हैं जोड़ियां’ किसी शायर की यह पंक्तियां तीन तलाक या फिर बिखरते दांपत्य जीवन पर सटीक बैठती है। यदि पति-पत्नी के बीच वफादारी रहे, एक दूसरे का सम्मान रहे तो शायद किसी कानून की जरूरत ही न पड़े, लेकिन ऐसा होता नहीं है।
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तीन तलाक को कानूनी रूप प्रदान करने के लिए पेश किए गए बिल को गुरुवार को लोकसभा में मंजूरी मिल गई। जिससे मुस्लिम महिलाओं को निश्चित तौर पर राहत मिलेगी लेकिन उलमाओं ने इसे शरीयत यानी मजहबी कानून में हस्तक्षेप बताते हुए इसकी मुखालफत करने की बात कही है।

भाजपा ने जहां विधान सभा चुनाव व स्थानीय निकाय चुनावों में मुस्लिम प्रत्याशियों को चुनावी अखाड़े में उतारने से परहेज किया था, वहीं तीन तलाक को कानूनी दायरे में लाने की बात कहकर मुस्लिम महिलाएं, जो खासकर तलाक पीड़ित महिलाओं को अपने पक्ष में करने का दांव खेला। सरकार बनने के बाद अब उसे अमली जामा भी पहना दिया गया है। संसद में तीन तलाक पर कानून बनाने का बिल पेश किया गया। जिसे मंजूरी मिल गई लेकिन उसमें उलमाओं का रुख तल्ख हो गया है।
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-मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों के लिए लड़ना गलत नहीं है, क्योंकि शरीयत के कानून में भी एक साथ तीन तलाक देने को गलत बताया गया है, लेकिन मुस्लिमों के जज्बातों के साथ खेलना कतई ठीक नहीं है। मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड इस पर गंभीरता से विचार करके निर्णय देगा, मुसलमानों को शरीयत के कानून का एहतमाम करना चाहिए।
-मौलाना मुहम्मद नाजिम शहर इमाम चंदौसी

-तलाक पर पहले से ही शरीयत में कानून बना है, तीन तलाक को शरीयत में भी ठीक नहीं माना जाता है। जो भी संसद में बिल पेश किया गया है या फिर पारित किया गया है, उसे शरीयत की रोशनी में देखा जाएगा, यदि शरीयत के कानून के विपरीत हुआ तो उसकी मुखालफत की जाएगी।
-हाजी मरगूब हुसैन, शहर काजी चंदौसी

-तीन तलाक के मुद्दे पर उलमाओ की जो भी राय हो, वह उसे सही तरीके से पेश कर सकते हैं लेकिन मेरे विचार से संविधान के तहत बने कानून को मानना और उस पर अमल करना बहुत जरूरी है। न्यायालय के आदेश का पालन तो करना ही होगा।
-लाल मुहम्मद शास्त्री वरिष्ठ अधिवक्ता चंदौसी

-तलाक को लेकर महिलाओं को प्रताड़ित नहीं किया जाना चाहिए, उन्हें पुरुषों के समान समाज में बराबरी का दर्जा मिलना चाहिए। ताकि वह भी सम्मानजनक जीवन जी सके। कुछ ऐसा होना चाहिए, जिससे शरीयत का भी उल्लंघन न हो और भारतीय कानून का भी पालन नितांत आवश्यक है।
-अनीस बानो गृहिणी चंदौसी

-संसद ने जिस तीन तलाक के कानून को मंजूरी दी है, उसे पहले विस्तार से समझा जाना चाहिए, अनावश्यक रूप से किसी का विरोध या पक्ष करना उचित नहीं है। सामाजिक तौर पर महिलाओं को सम्मान मिलना ही चाहिए, क्योंकि आज महिलाओं कहीं भी पुरुषों से पीछे नहीं है।
-शहनाज बेगम गृहिणी चंदौसी

-मसला मजहबी कानून का है, तो उसे भी मानना जरूरी है, लेकिन महिलाओं को संवैधानिक अधिकार भी आवश्यक है, इसलिए ऐसा प्राविधान होना चाहिए, जिससे शरीयत के कानूनों का पालन भी हो जाए और महिलाओं को आसानी से कोई तीन तलाक भी न दे सके।
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-बदर जहां खुर्शीद शिक्षिका संभल
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