भगवान श्रीकृष्ण द्वारा देवराज इंद्र के प्रकोप से गोकुल, वृंदावन व मथुरावासियों को बचाने के लिए गोवर्धन पर्वत को अपनी उंगली पर उठाया था। उसी गिरिराज पर्वत की एक िशला को चौदह साल पहले चंदौसी में लाया गया था। उसकी खूब पूजा अर्चना भी की जा रही थी।
लोग मिनी गोवर्धन मानकर यहीं िशला की परिक्रमा कर लेते थे, लेकिन धीरे धीरे कुछ ऐसा हुआ कि लोगों के मन में यह धारणा घर कर गई कि शायद गिरिराज की िशला के कारण ही चंदौसी में बारिश कम हो रही है। आखिरकार गिरिराज को सिला को पूजन के बाद वापस वृंदावन के गोवर्धन पर्वत पर भिजवा दिया गया।
करीब साढ़े पांच हजार वर्ष पूर्व द्वापर में जब कन्हैया ने देवराज इंद्र की बजाय गोवर्धन पर्वत की पूजा शुरू करा दी तो देवराज कुपित हो गए। उन्होंने इतनी भीषण वर्षा की कि पूरा वृंदावन की डूबने लगा। आखिरकार, भगवान कृष्ण ने गोवर्धन पर्वत को अपनी उंगली पर उठा लिया, जिसके नीचे वृंदावन, गोकुल व मथुरा के लोग सुरक्षित रहे।
बात चौदह साल पहले की है, जब शहर के प्राचीन वेणु गोपाल मंदिर चंदौसी के पुजारी श्यामाचार्य (अब दिवंगत) व उनके सहयोगी गोवर्धन पर्वत की करीब बीस क्विंटल से अधिक भार वाली िशला को गोवर्धन पर्वत से चंदौसी ले आए। यहां स्थापित करके िशला की पूजा अर्चना शुरू हो गई।
पूरे चौदह साल तक लगातार पूजा अर्चना की जाती रही। चंदौसी को मिनी गिरिराज का दर्जा मिल गया। लोग गोवर्धन जाने की बजाय यहीं पर की परिक्रमा कर लेते थे, लेकिन पिछले कुछ सालों से आम जनमानस के दिलो दिमाग में यह धारणा उत्पन्न हो गई कि जब से यह िशला चंदौसी आई है, तब से ही चंदौसी में बरसात कम हो रही है, जिसका नुकसान लोगों को हो रहा है।
क्योंकि भगवान श्रीकृष्ण ने गिरिराज को यह वरदान दिया था कि उन्हें यहीं (वृंदावन) में रहकर पूजा जाएगा। यही कारण है कि पूरे देशभर में कोई भी व्यक्ति गोवर्धन पर्वत से एक छोटी से कंकड़ी भी कहीं नहीं ले गया। हालांकि पर्वतराज की ऊंचाई एक ऋषि के श्राप के कारण कम हो रही है।