कुढ़ फतेहगढ़ (संभल)। छाबड़ा गांव में बने प्राचीन झारखंडी शिव मंदिर का इतिहास करीब 150 से अधिक पुराना है। शिवरात्रि और सावन के सोमवार को यहां जलाभिषेक करने वाले श्रद्धालुओं की भारी भीड़ रहती है। चंदौसी समेत रामपुर व बदायूं जनपद के सीमावर्ती गांव के श्रद्धालु यहां कांवड़ चढ़ाते हैं। महाशिवरात्रि पर लंबी कतारें दिखाई देती हैं। यहां मेले जैसा माहौल रहता है।
मंदिर के व्यवस्थापक अस्सी वर्षीय चंद्रवीर रघुवंशी ने बताया कि मंदिर का इतिहास करीब 150 साल पुराना है। बताते हैं कि सहसपुर रियासत के राजा जगत सिंह को स्वप्न में यहां शिवलिंग होने बात पता चली थी। उन्होंने पहली बार स्वप्न की बात टाल दी। इसके बाद दोबारा से फिर स्वप्न आया, जिसमें छाबड़ा के समीप वट वृक्ष में के पास शिवलिंग होने की दृश्य दिखाई दिया। साथ ही उन्होंने सुना कि यहां पर कुछ लोग रहते हैं और गंदगी करते हैं। अगर तुमने शिवलिंग को उजागर नहीं किया तो नुकसान उठाना पड़ेगा। दोबारा स्वप्न में नुकसान होने की बात सुनकर राजा जगत सिंह ने इस स्थान की सफाई करा दी। इस दौरान उन्हें यहां वट वृक्ष के बीच में शिवलिंग दिखाई दिया। जिसके बाद शिवलिंग स्थापित कर मंदिर का निर्माण कराया गया। झाड़ियों के बीच वट से शिवलिंग निकलने से उनका नाम झारखंडी शिव पड़ गया है। बताया कि यह स्थापित शिवलिंग नहीं है, स्वयंभू शिवलिंग है।
झाडू चढ़ाने से दूर होता है चर्म रोग
मंदिर की मान्यता है कि यहां पर सोमवार को जलाभिषेक के साथ झाडू चढ़ाने से लोगों के मस्सू, सफेद दाग दूर हो जाते हैं। एक यह भी मान्यता है कि नि:संतान दंपती यहां पांच सोमवार विधिवत जलाभिषेक करें तो उन्हें संतान की भी प्राप्ति होती है।