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Sambhal News: यहां कभी लगती थी अंग्रेजों की अदालत

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अमरोहा(अमरोहा) में शहर के मोहल्ला कुरैशी में लखौरी ईंट से बनी अलीजान मंजिल आज भी अंग्रेजी दौर की यादें समेटे हुए है। अंग्रेजी शासन काल में यहां अदालत लगती थी। ब्रिटिश हुकूमत के जज के जरिए मुकदमों की सुनवाई की जाती थी। दीवानखाना, हवालात और बैरिस्टर के बैठने की जगह के निशां यहां आज भी मौजूद हैं। साल 1814 में तामीर इस इमारत पर उस दौर में अंग्रेजी फौज ने कब्जा कर लिया था। इसके बाद इस इमारत के मालिक को खुद इसे नीलामी में खरीदना पड़ा। साल 1814 में पीर कमालुद्दीन ने 45 बीघे में इस दीवानखाने की तामीर कराई थी। दीवानखाने के साथ ही उन्होंने एक खूबसूरत बंगला भी बनवाया था। उस समय यहां चारों तरफ जंगल ही जंगल था। सन 1846 में उनके निधन के बाद उनके बेटे पीर अमीन उद्दीन इस इमारत की देखरेख की। इस दौरान अंग्रेजी हुकूमत का दौर था। साल 1857 में जब मेरठ से पहला स्वतंत्रता संग्राम शुरू हुआ तो दूसरा बड़ा आंदोलन अमरोहा में इसी इमारत से शुरू हुआ था। रामपुर के एक नवाब की मदद से अंग्रेजों ने अमरोहा में अपना हेडक्वॉर्टर इसी इमारत में बनाया था। अंग्रेजी फौज ने बाद में इस इमारत पर कब्जा जमा लिया था। यहां अदालत लगानी शुरू कर दी थी। स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के साथ अन्य मुकदमों की सुनवाई शुरू हो गई थी। इक दौर ऐसा आया कि पीर अमीनउद्दीन को बंगले और दीवानखाने की देखरेख के लिए उल्टा अंग्रेजों से ही कर्ज लेना पड़ा था। कर्ज नहीं चुकाने और ब्याज बढ़ने की वजह से इस इमारत को नीलाम किया जाने लगा। यहां तक कि घर की भी नीलामी होने लगी। पीर अमीनउद्दीन के बेटे नजीरुद्दीन उर्फ अलीजान उस वक्त बरेली और इलाहाबाद (अब प्रयागराज) में वकालत करते थे। घर की नीलामी की जानकारी मिलने पर फौरन अमरोहा पहुंचे और बोली लगाकर घर को बचाया। तब उन्हीं के नाम से इस इमारत का अलीजान मंजिल पड़ गया था।
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