उत्तर भारत के कई राज्यों को यूरिया खाद की आपूर्ति करने वाली टाटा केमिकल्स प्राइवेट लिमिटेड (टीसीएल) बबराला के नार्वे की कंपनी के हाथों में जाने की चर्चा से कर्मचारियों में खलबली मच गई है। हालांकि, अब कर्मचारी सीधे अंतर्राष्ट्रीय नेटवर्क से जुड़ जाएंगे।
टीसीएल बबराला में करीब 442 अधिकारी-कर्मचारी हैं। यह कंपनी रोजाना 3500 टन यूरिया का उत्पादन करती है। जिसकी सप्लाई समूचे उत्तर भारत में होती है। यहां से उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान, पंजाब, हरियाणा आदि राज्यों में तो करीब सत्तर फीसदी यूरिया की आपूर्ति टीसीएल से होती है। चर्चा है कि टीसीएम मैनेजमेंट की डील 2670 करोड़ रुपये में नार्वे की बड़ी फर्टिलाइजर उत्पादक कंपनी ‘यारा’ के साथ हुई है। यारा इंटरनेशनल अब भारत में यूरिया उत्पादन क्षेत्र में कदम रख रही है।
इस चर्चा से अधिकारियों और कर्मचारियों में खलबली मच गई है। क्योंकि उन्हें भी अब विदेशी कंपनी के साथ ही कार्य करना पड़ेगा। हालांकि समझौते में यह स्पष्ट किया गया कि प्रबंधकीय व्यवस्थाओं के हस्तांतरण में भी आठ दस माह का समय लगेगा लेकिन कंपनी प्रबंधकीय व्यवस्था जब अपने हाथ में लेगी तो निश्चित तौर पर बदलाव तो होगा ही। इसी आशंका को ध्यान में रखते हुए कर्मचारी चिंतित दिखाई दे रहे हैं। वहीं कुछ कर्मचारियों का यह भी कहना है कि अब उन्हें यारा जैसी बड़ी कंपनी के अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क के साथ जुड़ने का मौका मिलेगा।
-नार्वे की कंपनी .यारा इंटरनेशनल के साथ 2670 करोड़ रुपये में यूरिया बिजनेस सेल्स डील होने की सूचना तो अधिकारिक रूप से ही अधिकारियों को दी गई है, अभी इससे अधिक कोई अन्य अधिकारिक जानकारी नहीं है। -रविंद्रनाथ राय, प्रशासनिक प्रबंधक, टीसीएल बबराला
27 साल पहले सोनिया गांधी ने किया था उद्घाटन
टाटा केमिकल्स लिमिटेड के बबराला स्थित फर्टिलाइजर प्लांट को अब नार्वे की कंपनी ‘यारा’ रन करेगी। यारा ने इस प्लांट को 2670 करोड़ में खरीद लिया है। इस प्लांट को लेकर स्थानीय लोगों की तमाम अच्छी बुरी यादें भी जुड़ी हैं। बड़ी तादाद में किसान आज भी मुआवजे की लड़ाई लड़ रहे हैं तो प्लांट की वजह से इलाके में भूगर्भ जल दूषित होने का मामला भी जमकर उछल चुका है। माना तो ये भी जा रहा है कि स्थानीय लेवल पर हो रहे बड़े विरोध की वजह से ही कंपनी ने इस प्लांट को बेचने का फैसला किया।
टीसीएल ने वर्ष 1989 में बबराला इंद्राधाम में अपना फर्टिलाइजर प्लांट स्थापित किया था। उस वक्त सोनिया गांधी इस प्लांट का उद्घाटन करने पहुंची थीं। इस प्लांट से देशभर में फर्टिलाइजर सप्लाई किया जाता है। इस प्लांट के बनने से इलाके की शक्ल बदल चुकी है। लोगों को बड़ी तादाद में रोजगार मिलने से इलाके में खुशहाली आई है। लेकिन स्थानीय लोगों की कई कड़वी यादें भी इस प्लांट के साथ जुड़ी हैं। 1992 में प्लांट ने उत्पादन शुरू किया था। लेकिन इलाके के 450 किसान आज भी मुआवजे की जंग लड़ रहे हैं। कई बार प्लांट के खिलाफ बड़े प्रदर्शन हो चुके हैं।
1998 में पूरे इलाके में पानी दूषित होने से पशुओं के मरने का मामला सुर्खियों में रहा था। इस प्लांट पर करीब 400 कर्मचारी काम करते हैं।
प्लांट को बेचे जाने से कर्मचारियों में भी अपनी नौकरी को लेकर असमंजस की स्थिति है और कर्मचारी घबराए हुए हैं। टाटा केमिकल्स लिमिटेड के अधिकारिक सूत्रों का कहना है कि अगले 9-10 माह में प्लांट नार्वे की कंपनी यारा को हैंडओवर कर दिया जाएगा।