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बस्तों के बोझ से दबीं खेल प्रतिभाएं

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बस्तों के बोझ से दबीं खेल प्रतिभाएं
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संभल। स्कूल सरकारी हों या निजी। कुछ को छोड़ दें तो ज्यादातर में खेल गतिविधियों पर ग्रहण लगा रहता है। ग्रामीण क्षेत्रों की खेल प्रतिभाएं संसाधनों के अभाव में पिछड़ रही हैं, कहीं स्कूलों के पास खेल के मैदान नहीं हैं तो कहीं मैदान होने के बावजूद बच्चों को कैद करके रखा जाता है।
खेल नर्सरियों के तरफ स्कूल का तनिक भी रुझान नही है, जिससे बस्ते के बोझ से खेल प्रतिभाएं निखर नहीं पा रही हैं। त्यागी स्पोर्ट्स कल्याणपुर के कोच भोले सिंह त्यागी बताते हैं कि क्षेत्र में अनेक खेल प्रतिभाएं छिपी हुई हैं। उनको तलाश कर तराशने की जरूरत है। माध्यमिक व सीबीएसई बोर्ड के विद्यालयों में मान्यता के लिए क्रीड़ास्थल का होना जरूरी होता है। इसका तय मानक भी होता है, जबकि हकीकत में विद्यालय किसी तरह मान्यता ले लेते हैं और बच्चों को कैद कर केवल पढ़ाई में दक्ष बनाते हैं। बच्चों को दोपहर के मध्याह्न भोजन के बाद भी थोड़ी राहत नहीं दी जाती, जिससे बच्चों के अंदर प्रतिभाएं दबी रह जाती हैं। दूसरी ओर, परिषदीय विद्यालयों में भी बच्चों के हुनर को निखारा नहीं जा पा रहा है।
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कई जगह पूरे हैं स्टेडियम के मानक
संभल। सिरसी के जवाहरलाल मेमोरियल नगर पंचायत इंटर कालेज, रोशन सिंह चौहान स्मारक महाविद्यालय टांडाकोठी समेत कई जगहों पर स्टेडियम के मानक को पूरा कर रहे मैदान हैं, लेकिन इस पर स्टेडियम नहीं बनाया जा सका है।
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बिना कोच के मुश्किल है पदक
संभल। हैमर थ्रो की अंतर्राष्ट्रीय खिलाड़ी सरिता सिंह बताती हैं कि खेल में कोच का होना आवश्यक है। बिना कोच के पदक लायक खिलाड़ी तैयार होना मुश्किल है। शुरुआती दौर में खिलाड़ियों को प्रशिक्षण मिल जाए तो वे आगे बढ़ेंगे और उन्हें बेहतर प्रशिक्षण व सुविधाएं मिल जाएंगी।
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