रोजवुड और शीशम की लकड़ी के इस्तेमाल से तैयार हैंडीक्राफ्ट प्रोडक्ट के आयात-निर्यात पर पाबंदी का नोटिफिकेशन जारी हो चुका है। पाबंदी प्रभावी होने के आसार को लेकर विदेशी आर्डर बुक कर चुके निर्यातक उलझन में हैं। अकेले संभल और सरायतरीन की निर्यात इंडस्ट्री को करीब 100 करोड़ रुपये वार्षिक का झटका लग सकता है। इससे पूरी इंडस्ट्री सकते में हैं।
अगर आप अपने ड्रांइग रूम को नेचुरल लुक देने के लिए शीशम और रोजवुड के उत्पादों को तवज्जो देते हैं तो अब इसे भूल जाएं। क्योंकि जल्द ही शीशम और रोजवुड से बने उत्पाद बीते कल की बात हो सकते हैं। कन्वेंशन ऑन इंटरनेशनल ट्रेड इन इंडेंजर्ड स्पिशीज (सीआईटीईएस) की जोहानसबर्ग में अक्तूबर 2016 में बैठक हुई। बैठक के बाद 29 नवंबर को एक नोटिफिकेशन जारी किया। नोटिफिकेशन में कहा गया है कि शीशम की लकड़ी डलबर्गा प्रजाति में आती है और इसे अनुसूची एक से हटाकर अनुसूची दो में लाया गया है। अनुसूची दो में वही प्रजातियां आती हैं जो प्रतिबंधित श्रेणी में हैं।
नोटिफिकेशन में कहा गया है कि अब शीशम की लकड़ी और इससे तैयार प्रोडक्ट के आयात-निर्यात पर पाबंदी रहेगी। नोटिफिकेशन पर आपत्ति और सुझाव के लिए 2 जनवरी 2017 तक का मौका सीआईटीईएस ने दिया है। इसी क्रम में एक्सपोर्ट प्रमोशन काउंसिल ऑफ हैंडिक्राफ्ट (ईपीसीएच) ने अपना रिप्रेजेंटशन देने की तैयारी की है।
ईपीसीएच ने निर्यातकों को पाबंदी के नोटिफिकेशन से अवगत कराते हुए यह जानना चाहा है कि उनके पास कितने आर्डर हैं और वे आर्डर कब तक पूरे हो जाएंगे। नोटिफिकेशन 2017 से प्रभावी किया जाना है। नोटिफिकेशन पर आपत्ति और प्रत्यावेदन मांगा गया। ईपीसीएच ने नोटिफिकेशन की प्रति निर्यातकों को भेजी है। ईपीसीएच पाबंदी न लगाए जाने की पैरवी कर रहा है। पाबंदी प्रभावी हुई तो यूरोप, अमेरिका और आस्ट्रेलिया में शीशम से तैयार भारतीय हैंडीक्राफ्ट के आईटम का 1000 करोड़ रुपये वार्षिक निर्यात का कारोबार प्रभावित होगा।
ये प्रोडक्ट होते हैं निर्यात
शीशम की लकड़ी से कलात्मक फर्नीचर के अलावा हैंडीक्राफ्ट के 100 से अधिक आइटम ऐसे हैं जिनमें किसी न किसी रूप में शीशम की लकड़ी का इस्तेमाल होता है। लकड़ी के बेस पर हड्डी सींग के टुकड़ों से सजावट करके फोटो फ्रेम तैयार किए जाते हैं। टी-कोस्टर, अगरबत्ती और मोमबत्ती के स्टैंड, टेबल लैंप, बच्चों की गुल्लक, नैपकिन होल्डर, ज्वेलरी बाक्स समेत 100 से अधिक प्रोडक्ट हैं। संभल के सरायतरीन में आर्टिफिशियल ज्वेलरी बनती है जिसमें ज्वेलरी को कलात्मक लुक देने के लिए हड्डी सींग और रेजेन मैटेरियल के साथ लकड़ी का इस्तेमाल होता है। इसके साथ ही सजावटी सामानों में लकड़ी का प्रयोग किया जाता है। अभी तक लकड़ी को स्वाभाविक तौर पर इस्तेमाल किया जाता रहा है।
इतना है सालाना निर्यात
इंडियन वुडेन हैंडीक्राफ्ट का कुल निर्यात 4000 करोड़ रुपये वार्षिक है। उसमें डलबर्गा प्रजाति के शीशम और रोजवुड के इस्तेमाल से तैयार होने वाले प्रोडक्ट का वार्षिक निर्यात 800-1000 करोड़ रुपये का है। अब शीशम पर लगी पाबंदी प्रभावी होते ही 1000 करोड रुपये का कारोबार प्रभावित होगा। इसमें संभल से करीब 100 करोड़ रुपये वार्षिक का निर्यात है। मुरादाबाद, संभल, सहारनपुर लकड़ी उत्पाद के बड़े केंद्र हैं।
बोले निर्यातक
मेरे पास अमेरिका के बहुत सारे आर्डर हैं जिनमें शीशम की लकड़ी का इस्तेमाल किया गया है। यह आर्डर फरवरी 2017 में जाने हैं। अगर शीशम की लकड़ी से जुड़े प्रोडक्ट पर पाबंदी का नियम जनवरी 2017 में प्रभावी हो गया तो मुश्किल आएगी। वैसे मुझे भरोसा है कि ईपीसीएच की पैरवी पर सरकार कम से कम उन सारे आर्डर को पूरा करने की गुंजाइश और अनुमति निर्यातकों को दिलाएगी जो पहले से पाइपलाइन में हैं। - मोहम्मद शारिक, निर्यातक।
संभल और सरायतरीन में शीशम की लकड़ी के बेस पर विभिन्न तरीके के प्रोडक्ट तैयार होते हैं। यूरोप और अमेरिका समेत 50 से अधिक देशों में निर्यात है। शीशम की लकड़ी का अपना ऐसा कलर है जो ग्राहकों को लुभाता है। लकड़ी प्रॉसेस करके जब प्रोडक्ट तैयार करते हैं तो तमाम प्रोडक्ट 100 वर्ष तक भी चलते रहते हैं। इसलिए अब शीशम की लकड़ी का विकल्प तलाशना इंडस्ट्री के लिए मुश्किल होगा। पाबंदी प्रभावी होते ही 100 करोड़ वार्षिक का निर्यात संभल-सरायतरीन में ही प्रभावित हो जाएगा।
- कमल कौशल वार्ष्णेय, निर्यातक।