अचानक से नरोत्तम ने आलू की बोरी छोड़ दी और उसने सोमपाल व अन्य मजदूरों से कहा कि वह टॉयलेट जा रहा है। एक मिनट में वापस आ जाऊंगा। अभी नरोत्तम ने शीतगृह से बाहर निकलकर एक दो कदम ही रखे थे कि अचानक कुछ गिरने की आवाज आई।
उसने पीछे मुड़कर देखा तो धूल का गुबार उठ रहा था और कुछ दिखाई नहीं दिया। वह घबराकर बाहर की ओर नीचे भागा। कुछ ही पल में शीतगृह गिर गया। कुछ दूर पहुंचने के बाद वह जमीन पर बैठ गया और सांस लेने के बाद उसने शोर मचाया। इसके बाद आस पड़ोस के लोग भी मौके की ओर दौड़े और बचाव कार्य में लग गए।
नरोत्तम अब बार-बार ईश्वर को याद कर रहे हैं। उसका कहना है कि वह बोरी छोड़ी बाहर नहीं आया होता तो वो ही दब सकता था। उनका कहना है कि मेरे साथी बोल रहे थे कि दस बारह बोरियां और हैं। इन्हें रखने के बाद ही चले जाना लेकिन मैंने किसी की बात नहीं सुनी और बाहर निकल आया। जिस कारण मेरी जिंदगी बच गई।