बुजुर्ग डॉ. बर्क के न रहने के बाद आई थी नरमी
डॉ. शफीकुर्रहमान बर्क के निधन से कुछ पहले ही सपा ने उन्हें पार्टी उम्मीदवार घोषित कर दिया था, जबकि उस वक्त इकबाल महमूद समर्थक डॉ. बर्क को ज्यादा उम्रदराज बताकर एमपी के लिए उनके (इकबाल महमूद) सपाई टिकट की वकालत कर रहे थे।
डॉ. बर्क के निधन के बाद सपा की उम्मीदवारी का नए सिरे से सवाल उठा तो भी इकबाल महमूद सशक्त उम्मीदवार के रूप में पेश किए गए। उस समय जियाउर्रहमान बर्क कुंदरकी से सपा विधायक थे। लिहाजा इकबाल महमूद का दावा ज्यादा मजबूत माना जा रहा था।
उस बीच डॉ. बर्क के निधन पर अफसोस जताने सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव के संभल आने पर इस सीट को डॉ. बर्क की मजबूत विरासत बताया गया। गमगीन माहौल के बीच भी इतनी पैरवी रही कि अखिलेश ने वहीं जियाउर्रहमान को उम्मीदवार बता दिया।
हालांकि इसके बाद दोनों परिवारों को नजदीक लाने की एक अन्य पहल पर एक-दूसरे के चुनाव में विरोध न करने पर रजामंदी बनी। इसके बाद से पुरानी तल्खी की जगह नरमी का रुख बढ़ने लगा।
दशकों पुरानी अदावत है दोनों परिवारों में
संभल अरसे से सपा का मजबूत गढ़ माना जाता है। सपा की इस मजबूती में भी बर्क और महमूद परिवारों की खेमेबंदी पार्टी अध्यक्ष से लेकर अन्य वरिष्ठ सपाइयों के लिए हमेशा बड़ी चिंता बनी रही। सपा के गठन से लेकर लंबी और मजबूत सियासी पारी का अनुभव रखने वाले मुलायम सिंह यादव भी इन दोनों दलीय नेताओं के दिलों को नहीं मिलवा सके थे।
सियासी लोग बताते हैं कि मुलायम सिंह यादव की सक्रियता के दौर में उनके दबाव में ही सिर्फ एक बार डॉ. बर्क और इकबाल महमूद एक मंच पर नजर आए थे। इसके बाद भी दोनों कभी एक-दूसरे के चुनाव में सहयोगी रुख से आगे नहीं आए।
इसके उलट दोनों के बीच एक-दूसरे के मुखालिफ चुनाव लड़ने या लड़ाने के उदाहरण दर्ज हैं। दोनों परिवारों के बीच यह अदावत उस वक्त से है जब संभल के चुनावी मैदान में इकबाल महमूद के पिता नवाब महमूद चुनाव लड़ते थे।