गांव में रात को छाने वाले घुप्प अंधेरा, कच्ची सड़कें और जगह-जगह पड़े कूड़े के ढेर गांव की बदहाली की तस्वीर पेश कर रहे हैं। इलाज के लिए ग्रामीणों को संभल और असमोली जाना पड़ता है।
तहसील मुख्यालय से से 20 किलोमीटर दूरी पर बसी ग्राम पंचायत पनसुखा की आबादी 4000 हजार है। ग्राम पंचायत पनसुखा में दो मिलक (मझरे) आते हैं। इनमें शहीद के गांव पनसुखा मिलक की आबादी लगभग 700 है। लेकिन यहां के लोगों को मूलभूत सुविधाएं भी मय्यसर नहीं हैं। सड़क, बिजली और स्वास्थ्य सेवाओं को भले ही गांवों की प्रगति से जोड़ा जाता हो, लेकिन यहां के ग्रामीणों के लिए ये कागजी बातें हैं। गांव की सड़कें कच्ची है तो बिजली का नामोनिशान नहीं है।
स्वास्थ्य सेवाएं भी यहां के लोगों के लिए दूर की कौड़ी ही हैं। देश के लिए जान न्यौछावर करने वाले सुधीश कुमार का गांव शासन की उपेक्षा के चलते विकास के मामले में फिसड्डी ही है। सड़कों के गहरे गड्ढे और विद्युतीकरण नहीं होना गांव के विकास की तस्वीर पेश कर रहे हैं। गांव के लोग बताते हैं कि सुधीश कुमार जब छुट्टी पर आते थे तो वह गांव को बदहाली से निजात दिलाने के लिए प्रयास करते रहते थे। गांव के विद्युतीकरण के लिए पैरवी कर रहे थे।
उनकी पैरवी के बाद बिजली विभाग की तरफ से गांव खंभे लगा दिए गए। मगर अभी तक तार नहीं खीचे गए हैं। गांव के आसपास में कोई सरकारी अस्पताल भी नहीं है। अगर पनसुखा मिलक में अगर कोई व्यक्ति बीमार हो जाता है तो उसे सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं का लाभ लेने के लिए संभल और असमोली जाना पड़ता है। असमोली दस किलोमीटर और संभल बीस किलोमीटर दूर है। यदि कोई व्यक्ति वहां तक नहीं जा सकता है तो उसे अपने गांव में झोलछाप से इलाज कराना पड़ता है।