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Sambhal News: ...लोग साथ आते गए और कारवां बनता गया

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चंदौसी (मुरादाबाद)।
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‘मैं अकेला ही चला था जानिब-ए-मंजिल मगर, लोग साथ आते गए और कारवां बनता गया।’ मशहूर शायर मजरूह सुल्तानपुरी का यह शेर चंदौसी के प्रसिद्ध गणेश चौथ मेले के सफर पर सटीक बैठता है। वो सफर जिसकी शुरुआत सन 1961 में ठेले पर मिट्टी की गणेश प्रतिमा रखकर नगर भ्रमण से हुई थी।
अपने भाइयों के साथ मिलकर यह शुरुआत की थी डॉ. गिरिराज किशोर गुप्ता (अब दिवंगत) ने, जो एमबीबीएस चिकित्सक थे। उस वक्त किसी ने नहीं सोचा था कि मरीजों की नब्ज पकड़कर दवा देने वाले चिकित्सक का हाथ श्रद्धाभाव से सराबोर रहने वाले चंदौसीवासियों की उस नब्ज पर भी है, जो भविष्य में पूरे शहर को भक्ति रूपी औषधि के रस में डुबो देगी।
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आज स्थिति ऐसी ही है। चंदौसी ही नहीं, बरस-दर-बरस नजदीकी जनपदों के लोग और दूर-दराज के दुकानदार, खेल-तमाशे वाले मेले से जुड़ते गए और गणेश चौथ मेले का दायरा और आकर्षण बढ़ता गया। गणेश चतुर्थी पर मेला कमेटी की ओर से निकाली जाने वाली रथयात्रा की मान्यता उत्तर भारत के सबसे बड़े गणेश उत्सव के रूप में होने लगी।डॉ. गिरिराज किशोर गुप्ता के बेटे एवं गणेश मेला परिषद के सदस्य मनोज कुमार गुप्ता ‘मीनू’ बताते हैं कि इस मेले में सवा लाख से ज्यादा लोगों की भीड़ जुटती है। रथयात्रा वाले दिन चंदौसी की सड़कों पर पैदल चलने के लिए भी जगह तलाशना कठिन हो जाता है।
गणेश मंदिर निर्माण से जुड़ी यह है मान्यता

मेला इंचार्ज रविंद्र कुमार रूपी बताते हैं कि मेले और रथयात्रा की शुरुआत से पुराना गणेश मंदिर का इतिहास है। उनके दादा (डॉ. गिरिराज के पिता) लाला भूपाल दास एक मकान का निर्माण करा रहे थे। हॉल जैसा बड़ा कमरा बन गया था। एक रात उसमें एक हाथी का बच्चा आकर बैठ गया था। सुबह सभी ने उसे उठाने और बाहर निकालने का प्रयास किया लेकिन सफलता नहीं मिली। लाला भूपाल दास के परम मित्र पंडित हनुमान सिंह से सलाह ली तो उन्होंने कहा कि लाला जी आप पर गणेश जी की विशेष कृपा हो गई। उनकी उपासना करके इस स्थान पर गणेश मंदिर निर्माण का संकल्प लो। मौके पर इस तरह की बातचीत चल ही रही थी कि इसी बीच हाथी का बच्चा वहां से हट गया। इसके बाद लाला भूपाल दास ने उसी समय वहां पर मंदिर की नींव पूजन करा दिया। कुछ वर्षों में मंदिर तैयार हो गया, जो चंदौसी के लोगों के लिए उपासना का बड़ा केंद्र है।
स्वचालित झांकियां हैं बड़ा आकर्षण

गणेश मेले में रथयात्रा की शुरुआत परिवार के बच्चों को भगवान के स्वरूपों में सजाकर की गई थी। भगवान गणपति, विष्णु, शंकर व अन्य देवरूप का शृंगार कर बच्चों को रथयात्रा में शामिल किया गया था। करीब आठ साल के बाद डॉ. गिरिराज किशोर ने स्वचालित झांकियाें की पहल की, जिसमें भगवान की ऊंचे आकार वाली प्रतिमाएं रथयात्रा में शामिल की गईं, जिनमें बिजली और मोटर की मदद से एक्शन नजर आता था। इन प्रतिमाओं की गतिशीलता और ऊंचा आकार मेले के प्रति के प्रति लोगों का आकर्षण का बढ़ाता है।
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आज होगा महाकालेश्वर की झांकी का उद्घाटन

गणेश मंदिर के सामने विनायक विहार में इस बार महाकालेश्वर की झांकी को बनाया गया है। यहां पर महाकालेश्वर उज्जैन के स्वरूप को स्थापित किया गया है। श्रद्धालु 30 फीट ऊंचाई पर चढ़कर श्रद्धालु भगवान महाकालेश्वर के के दर्शन करेंगे। सोमवार को प्रशासनिक अधिकारी इसका विधिवत उद्घाटन करेंगे। संवाद
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