मुरादाबाद, रामपुर और संभल मीट के बड़े निर्यातक जिलों मेें हैं। निर्यातक इकाइयों को अपने लेबर को छुट्टी देनी पड़ी है। निर्यात लुढ़क गया है। नोटबंदी की वजह से स्थानीय बाजार बैठ गया है। नानवेज के शौकीन लोग छोटे नोटों की कमी के चलते मीट-चिकन खरीदने से गुरेज कर रहे हैं। मीट-चिकन की स्थानीय खरीदारी एकदम से बंद हो गई है।
अमर उजाला ब्यूरो
संभल/मुरादाबाद।
नोट बंदी के फैसले से मीट कारोबार पर असर है। तेरह दिनों में कारोबार को बीस करोड़ रुपये से अधिक का नुकसान हो चुका है। जानवरों की आवक रुक गई जिसका असर मांस के निर्यात पर पड़ा है। मीट फैक्ट्री के संचालकों का कहना है कि अब कारोबार दस प्रतिशत भी नहीं है। यदि करेंसी का संकट सात दिन और खिंच गया तो फैक्ट्री बंद करनी पड़ेगी।
संभल की फैक्ट्रियों से लगभग सभी देशों में मांस का निर्यात होता है। बड़ी संख्या में बिहार और बंगाल के लेबर काम करते हैं। मीट की तीन बड़ी फैक्ट्रियां इस समय पर संचालित हैं। नोट बंदी से पहले मीट फैक्ट्रियों में 1000 से अधिक मजदूर काम कर रहे थे लेकिन जब से नोट बंद हुए उसके बाद पशुओं की आवक एकदम से कम हो गई। मांस की पैकिंग से लेकर तमाम कामों में लगी लेबर पर संकट आ गया और इसके चलते मजदूरों की छुट्टी शुरू हो गई। पांच दिन में 500 से अधिक श्रमिक खाली हो गए हैं। जो बाहर के थे वे अपने-अपने घरों को चले गए। जो नहीं जा सके हैं वे अब जा रहे हैं। स्थानीय लेबर को भी कहा गया है कि जब काम होगा तब बुलाएंगे।
तीनों फैक्ट्रियों से मांस का निर्यात तकरीबन बंद हो गया है। लेबर अब दूसरे रोजगार की तलाश कर रही है। फैक्ट्री स्वामियों ने कह दिया है कि जब नई करेंसी का फ्लो होगा तभी बाहर से जानवर आएंगे और इसके बाद ही काम शुरू हो पाएगा। फैक्ट्री संचालकों से हुई बातचीत से जो जानकारी सामने आई है उसके हिसाब से मीट फैक्ट्रियों से जुड़े कारोबार को बड़े नोट बंद होने के बाद 20 करोड़ रुपये से अधिक की चोट हुई है। करीब 1000 श्रमिकों के बेकार हो जाने का खतरा पैदा हो गया है।
मीट इंडस्ट्री में एक दिन में दो से तीन करोड़ का कारोबार होता है। पिछले तेरह दिनों में इसमें लगातार गिरावट आई है और इंडस्ट्री को अब तक बीस करोड़ रुपये से अधिक का झटका लग चुका है। इंडस्ट्री बंदी की कगार पर है। जो थोड़ा बहुत जानवर उधार पर मिल रहे हैं उन्हीं से पांच दस प्रतिशत काम हो रहा है। लेकिन नोट बंदी के बाद जो हालात हैं उससे लगता है कि फैक्ट्री बंद करनी पड़ेगी। बैंक से कैश नहीं मिल रहा है। जो माल गया था उसका पेमेंट खाते में पड़ा हुआ है। इधर लेबर को देने और जानवर खरीदने के लिए करेंसी नहीं है। क्या करें। - हाजी मेंबर शकील, संचालक, अल फलाह फ्रोजन फूड्स।
पूरी मीट इंडस्ट्री मरणासन्न अवस्था में है। जानवर नहीं आ रहे हैं। स्लाटिंग बंद हो गई है। काम कुल पांच से दस प्रतिशत ही रह गया है। यह सीजन चीन में मांस के निर्यात का है। लेकिन माल ही नहीं है। फैक्ट्री खाली पड़ी है। - सबीउद्दीन, संचालक अल रहमान फ्रोजन फूड्स।
बैंकों से कैश न मिल पाने की वजह से काम न के बराबर रह गया है। दिक्कतें ही दिक्कतें हैं। फैक्ट्री में जो लेबर रोजाना काम कर रही थी वह खाली हो गई है। क्योंकि अब उधार में जानवर नहीं मिल रहे हैं। मजदूरों का भुगतान भी फंस गया है। - हाजी रिजवान अहमद, संचालक, इंडिया फ्रोजन फूड्स।
मीट के मौजूदा रेट
- बड़े का 150 से 180 रुपये प्रति किलो
- मटन 150 से 200 रुपये प्रति किलो तक
- चिकन 400 रुपये प्रति किलो तक
(फिलहाल रेट पर कोई प्रभाव नहीं है)