सरायतरीन (संभल) गांव विक्रमपुर ताहरपुर में श्रीमद् भागवत कथा से पूर्व रविवार को कन्याओं ने हवन में आहुति देकर गोमाता की रक्षा का संकल्प लिया। इसके बाद कथाव्यास ने भगवान श्रीकृष्ण-रुक्मणि के विवाह का प्रसंग सुनाया।
कथाव्यास हेमेंंद्र शास्त्री ने बताया कि विदर्भ देश के राजा भीष्मक की पुत्री रुक्मणि बुद्धिमान सुंदर और सरल स्वभाव वाली थीं। पुत्री के विवाह के लिए पिता भीष्मक योग्य वर की तलाश कर रहे थे। राजा के दरबार में जो कोई भी आता वह श्रीकृष्ण के साहस और वीरता की प्रशंसा करता। कृष्ण की वीरता की कहानियां सुनकर देवी रुक्मणि ने उन्हें मन ही मन पति मान लिया था। राजा भीष्मक के पुत्र रुक्म का खास मित्र चेदिराज शिशुपाल रुक्मणि से विवाह करना चाहता था।
रुक्म के कहने पर राजा ने शिशुपाल से देवी रुक्मणि का विवाह तय कर दिया लेकिन रुक्मणि श्रीकृष्ण के अलावा किसी को भी अपने पति के रूप में स्वीकार नहीं करना चाहती थीं। उन्होंने अपने प्रेम का संदेश श्रीकृष्ण तक पहुंचाया। श्रीकृष्ण को जब ये बात पता चली तो रुक्मणि को संकट में देख वह विदर्भ राज्य पहुंचे। शिशुपाल जब विवाह के लिए द्वार पर आया तो कृष्ण ने रुक्मणि का हरण कर लिया। इसके बाद श्रीकृष्ण शिशुपाल और रुक्म के बीच भयंकर युद्ध हुआ और इसमें द्वारकाधीश कृष्ण विजयी हुए। कृष्ण देवी रुक्मणि को द्वारकाधीश ले आए और यहीं उनका विवाह हुआ। इस दौरान महंत धर्म भारती महाराज, पूर्व प्रधान वीरभान सिंह यादव, वीरेश यादव, रविंद्र यादव, धर्मवीर यादव, प्रदीप यादव, देव पाल, पप्पू यादव, अवधेश यादव आदि रहे।