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UP: संभल में वर्षों से चल रहा सरकारी जमीन पर गड़बड़ी का खेल, चार पट्टे निरस्त, अफसरों-माफिया का गठजोड़ उजागर

Sat, 18 Jul 2026 12:25 PM IST
Vimal Sharma संवाद न्यूज एजेंसी, संभल

सार

संभल के गुन्नौर तहसील क्षेत्र के गांव सूरपुर में गंगा की 31 बीघा जमीन पर वर्ष 1991 में किए गए चार पट्टों को एडीएम सत्यप्रिय सिंह ने निरस्त कर दिया है। जांच में पता चला कि जलमग्न भूमि की श्रेणी बदलकर नियमों के विरुद्ध आवंटन किया गया था।
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संभल में सरकारी जमीन घोटाला - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
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विस्तार
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गुन्नौर तहसील के रजपुरा ब्लॉक अंतर्गत गांव सूरपुर में 1991 में गंगा की 31 बीघा जमीन पर चार लोगों को दिए गए पट्टे एडीएम ने निरस्त कर दिए हैं। नियमों की अनदेखी कर श्रेणी बदल दी गई थी और आवंटन कर दिया गया था। यह मामला भी प्रशासन तक पहुंचा तो इसकी जांच कराई गई। इसमें खेल सामने आया कि वर्तमान राजस्व अभिलेख खतौनी में यह भूमि असंक्रमणीय भूमिधर के रूप में अंकित थी।

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यानि ऐसी जमीन जिस पर खेती की जा सकती है लेकिन बेची या दान नहीं दी जा सकती। जबकि जोत चकबंदी आकार पत्र 41 व 45 में इसे श्रेणी-6 (1) जलमग्न भूमि (नदी) के रूप में दर्ज किया गया था। जांच में यह तथ्य सामने आए तो पूरा खेल सामने आ गया। इसमें भी अधिकारियाें की मिलीभगत रही। 

एडीएम सत्यप्रिय सिंह ने गुन्नौर एसडीएम की 16 अप्रैल को मिली रिपोर्ट के आधार पर पट्टे निरस्त करने कार्रवाई की है। एडीएम ने बताया कि सभी चार पट्टों का आवंटन उत्तर प्रदेश राजस्व संहिता 2006 की धारा-128 के तहत नियम विरुद्ध पाया गया था।
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यह पट्टे गांव सूरपुर निवासी श्रीनिवास, शेर सिंह, शकुंतला और गांव पतेई कायस्थ निवासी प्रकाशचंद्र को आवंटित किए गए थे। इनका आवंटन 17 नवंबर 1991 में किया गया था। आवंटन की पत्रावली सुरक्षित है। एडीएम ने कहा कि पट्टे निरस्त करने के साथ ही राजस्व अभिलेखों में पूर्व स्थिति बहाल करने का आदेश कर दिया है।
 
श्रेणी बदलकर 31 बीघा जमीन पर पट्टे किए गए थे, इनको निरस्त कर दिया गया है। भूमि को नदी की श्रेणी में दर्ज करने का आदेश किया है। आवंटन नियमों के खिलाफ जाकर नदी की जमीन पर किया गया था। -सत्यप्रिय सिंह, एडीएम, संभल

गुन्नौर तहसील क्षेत्र में गंगा की जमीन पर अवैध पट्टे कराकर खनन करने का खेल दशकों पुराना है। अफसरों से मिलीभगत कर गंगा की जमीन की श्रेणी बदलवाना और फिर पट्टे आवंटित करा लेना। अभिलेख गवाह बना दिए जाते और फिर अफसर भी इसमें हाथ नहीं डाल पाते। इसका फायदा दशकों से माफिया उठाते चले आ रहे हैं।

गुन्नौर तहसील में ऐसे तमाम पट्टे हैं जो अभिलेख में तो कृषि भूमि के रूप में दर्ज हैं लेकिन वह गंगा की जमीन पर हैं।डीएम अंकित खंडेलवाल ने ही इन मामलों को गंभीरता से लिया है। इस कारण परत दर परत खुलती जा रही है। डीएम ने बताया कि सुखैला में अवैध पट्टों के मामले में अफसर-कर्मचारियों की भूमिका सामने आ चुकी है। आरोपियों को जेल भेजा जा चुका है।

ग्राम पंचायत असदपुर के गैरआबाद गांव सुखैला में 845 बीघा गंगा की जमीन पर 162 अवैध पट्टे का मामला सामने आने के बाद जांच आगे बढ़ी तो गांव सूरपुर में 31 बीघा जमीन पर चार पट्टे का मामला भी उजागर हुआ है। सुखैला में 2019 में पट्टे किए गए थे और सूरपुर में 1991 में आवंटन हुआ था।

इन दोनों ही पट्टों में श्रेणी बदलकर आवंटन किया गया था। अभिलेख में कृषि भूमि दर्शाया गया और मौके पर गंगा की जमीन है जहां से रेत निकलता है। मतलब इस जमीन पर फसल भी नहीं की जा सकती है। तरबूज और खरबूज तो बस कर लिया जाता है। इसके अलावा रेत का खनन ही मकसद रहता है।

चकबंदी और राजस्व के अधिकारी इसमें मिलीभगत कर लेते हैं और पट्टों का आवंटन आसानी से हो जाता है। माफिया और अफसरों की मिलीभगत से बड़ा भ्रष्टाचार सामने आया है। 850 बीघा (71.5500 हेक्टेयर) सरकारी जमीन को अवैध पट्टों से खुर्दबुर्द कर दिया गया। इस जमीन का अनुमानित मूल्य लगभग 18 करोड़ रुपये है।

रजपुरा, गुन्नौर और जुनावई ब्लॉक के कई गांवों में गंगा किनारे हैं पट्टे
रजपुरा, गुन्नौर और जुनावई ब्लॉक के सैकड़ों आबाद और गैर आबाद गांव गंगा किनारे हैं। इन गांवों में अलग-अलग समय पर अवैध पट्टे किए गए हैं। अभिलेखों में कृषि पट्टे दर्ज हैं लेकिन हकीकत में वह गंगा की रेतीली जमीन के पट्टे हैं। इनमें पूरा खेल प्रशासन की जांच के बाद सामने आएगा। डीएम इसकी जांच करा रहे हैं। दो मामले सामने आ चुके हैं और अन्य मामले भी जल्द पकड़ में आएंगे।

गंगा किनारे के सभी पट्टों की जांच चल रही
संभल जिला सितंबर 2011 में बना है। इससे पहले गुन्नौर तहसील क्षेत्र बदायूं जिले का हिस्सा हुआ करता था। उस समय इस इलाके में अवैध खनन बड़े पैमाने पर चलता था। जब संभल जिला बना तो इस पर कुछ हद तक अवैध खनन पर अंकुश लगा लेकिन जिन लोगों ने फर्जीवाड़ा कर जो पट्टे करा रखे थे वह अनुमति लेकर खनन कराते रहे और शासन और प्रशासन को इसकी भनक तक नहीं लगी। जबकि पट्टे भले दूसरे लोगों के नाम पर होते हैं लेकिन इनका लाभ कुछ ही असरदार लोग उठाते हैं।
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इनका विरोध लोग कर भी नहीं पाते क्योंकि हर शासन में इन असरदार लोगों का राजनीतिक संरक्षण बना रहता है। इससे ही यह पट्टे अवैध बढ़ते चले गए और अफसर भी मिलते रहे। क्योंकि जमीनी हकीकत इस कार्रवाई से पहले कभी देखने के लिए बड़े अफसर पहुंचते ही नहीं थे। इसका ही माफियाओं ने लाभ उठाया है।
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