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Sambhal News: बर्क पर दांव से इकबाल के तीखे तेवर

Wed, 31 Jan 2024 03:55 AM IST
मुरादाबाद ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, संभल
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संभल। सांसद डॉ. शफीकुर्रहमान बर्क को सपा ने एक बार फिर संभल सीट से लोकसभा प्रत्याशी घोषित कर दिया है। सांसद के धुर विरोधी और संभल से सपा विधायक इकबाल महमूद ने इस पर तल्ख टिप्पणी की है। विधायक इकबाल महमूद ने प्रतिक्रिया देते हुए कहा है कि वह अपने समर्थकों के साथ मंथन करेंगे। उसके बाद निर्णय करेंगे कि चुनाव में सपा प्रत्याशी को लड़ाना है या नहीं। विधायक भी संभल लोकसभा सीट से टिकट की मांग कर रहे थे, लेकिन पार्टी ने डॉ. बर्क को प्रत्याशी घोषित कर दिया।
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सांसद डॉ. बर्क और विधायक इकबाल महमूद एक ही पार्टी में होने के बाद भी धुर विरोधी हैं। दोनों परिवारों के बीच 57 साल से राजनीतिक रस्साकशी चल रही है। इसकी शुरुआत 1967 से हुई थी। इकबाल महमूद के पिता और दो बार के विधायक महमूद हसन खां के सामने 1967 में डाॅ. शफीकुर्रहमान बर्क पहली बार चुनावी मैदान में उतरे थे। इसके चलते महमूद हसन खां को हार का सामना करना पड़ा था और जनसंघ पार्टी के प्रत्याशी महेश कुमार विधायक बन गए थे।
उसके बाद 1969 में फिर से डॉ. बर्क और महमूद हसन खां आमने सामने चुनाव लड़े। हालांकि, इस चुनाव में महमूद हसन खां को जीत मिली थी। इसके बाद दोनों के बीच आमना-सामना 1974 के विधानसभा चुनाव में हुआ। इस चुनाव में पहली बार डॉ. बर्क जीते और संभल विधानसभा क्षेत्र से विधायक बने। यहां से दोनों परिवारों के बीच राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता और बढ़ती चली गई। डाॅ. बर्क ने 1977 में लगातार दूसरी बार जीत हासिल की और महमूद हसन खां को हार का सामना करना पड़ा।
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दोनों ही नेताओं के बीच 1980 में फिर मुकाबला हुआ। इस चुनाव में दोनों को हार मिली और कांग्रेस प्रत्याशी शरियतुल्ला के सिर जीत का सेहरा बंधा। 1985 के विधानसभा चुनाव में डाॅ. बर्क को जीत मिली। महमूद हसन खां ने 1989 आते-आते अपनी राजनीति विरासत अपने बेटे इकबाल महमूद को साैंप दी। इसके बाद इकबाल महमूद और डॉ. बर्क के बीच राजनीतिक युद्ध शुरू हो गया। 1989 में डाॅ. बर्क ने इकबाल महमूद को हरा दिया। दो साल बाद फिर से विधानसभा चुनाव हुए और 1991 में इकबाल महमूद ने डाॅ. बर्क को पराजित कर दिया और पहली बार इकबाल महमूद विधायक बने।
वर्ष 1993 में डॉ. बर्क और इकबाल महमूद के बीच बराबरी की टक्कर हुई और इसका फायदा भाजपा प्रत्याशी सत्यप्रकाश गुप्ता को मिला और वो विधायक बन गए। वर्ष 1995 में दोनों नेताओं ने सपा का दामन थाम लिया। 1996 में मुरादाबाद लोकसभा क्षेत्र से सपा ने डॉ. बर्क को प्रत्याशी बनाया, जिसमें डा. बर्क पहली बार सांसद चुने गए। इसी साल हुए विधानसभा चुनाव में सपा ने इकबाल महमूद को संभल विधानसभा क्षेत्र से प्रत्याशी बनाया और इकबाल महमूद विधायक बन गए। इसके बाद से इकबाल महमूद संभल विधानसभा क्षेत्र से सपा के टिकट पर लगातार विधायक बनते आ रहे हैं।
एक बार फिर संभल सीट से टिकट मिलने के बाद सांसद डॉ. बर्क ने कहा कि यहां सपा के टिकट के लिए कई दावेदार थे, लेकिन पार्टी ने मुझ पर भरोसा जताया। जो दावेदार थे उनसे मेरा कोई मतभेद नहीं है। सभी भाजपा को हटाने और अखिलेश यादव को मजबूत करने के लिए मेरा समर्थन करें। सपा ने डॉ. बर्क को सातवीं बार लोकसभा का प्रत्याशी बनाया है। डॉ. बर्क एक बार बसपा के टिकट पर चुनाव लड़कर सांसद बन चुके हैं।
2002 में डॉ. बर्क पर भारी पड़े थे इकबाल
1999 हुए लोकसभा चुनाव में डॉ. बर्क को हार मिली तो 2002 में हुए विधानसभा चुनाव में डाॅ. बर्क एकबार फिर इकबाल महमूद के सामने चुनावी मैदान में उतर पड़े। सपा ने संभल विधानसभा सीट से इकबाल महमूद को प्रत्याशी बनाया तो डाॅ. बर्क ने राष्ट्रीय परिवर्तन दल के टिकट पर चुनाव लड़ा। हालांकि, इस चुनाव में इकबाल महमूद भारी पड़े और डॉ. बर्क को हार का सामना करना पड़ा। इसके बाद डॉ. बर्क ने विधानसभा चुनाव नहीं लड़ा।
2009 में फिर आमने-सामने आए बर्क और महमूद
डॉ. बर्क 2004 में मुरादाबाद लोकसभा सीट से सांसद बने थे। वर्ष 2009 में परिसीमन हुआ तो सपा ने इकबाल महमूद को संभल लोकसभा क्षेत्र से प्रत्याशी बना दिया। डाॅ. बर्क बसपा में शामिल हो गए और संभल लोकसभा सीट से इकबाल महमूद के सामने दावा ठोंक दिया। इस चुनाव में डॉ. बर्क को जीत मिली थी। उस समय डाॅ. बर्क की दमदारी को सपा ने भी माना और 2014 में सपा ने उन्हें प्रत्याशी बनाया था। हालांकि, भाजपा प्रत्याशी से करीब पांच हजार मतों से डॉ. बर्क हार गए थे।

मुलायम के बाद अखिलेश ने भी किया विरोध खत्म कराने का प्रयास
डॉ. बर्क और इकबाल महमूद के बीच चल रहे राजनीतिक विरोध को खत्म कराने के लिए पहले पूर्व मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव ने भी काफी प्रयास किए, लेकिन वो सफल नहीं हुए। बाद में अखिलेश यादव ने भी दोनों नेताओं के बीच के मतभेद को मिटाने की कोशिश की, लेकिन उन्हें भी सफलता नहीं मिली। राजनीतिक जानकारों का कहना है कि यह विरोध ही दोनों दिग्गज नेताओं की मजबूती का आधार है।

बागी तेवर दिखाने के बाद भी टिकट पाने में कामयाब रहे सांसद डॉ. बर्क
पिछले साल हुए निकाय चुनाव में संभल नगर पालिका सीट से सपा ने विधायक इकबाल महमूद की पत्नी रुखसाना इकबाल को प्रत्याशी बनाया था। सांसद ने सपा प्रत्याशी का विरोध करते हुए निर्दलीय प्रत्याशी फरहाना यासीन के समर्थन में प्रचार किया था। इसका परिणाम यह रहा कि सपा प्रत्याशी और निर्दलीय प्रत्याशी दोनों चुनाव हार गईं और एमआईएमआईएम की प्रत्याशी आशिया मुशीर ने जीत दर्ज की थी। इस बगावत के बाद भी पार्टी ने डॉ. बर्क पर ही भरोसा जताते हुए उन्हें पहली सूची में ही प्रत्याशी घोषित कर दिया।

भाजपा को हटाने के लिए वोट करेगी जनता : डाॅ. बर्क
प्रत्याशी घोषित किए जाने के बाद सांसद डॉ. बर्क ने कहा कि मैं अल्लाह का शुक्रगुजार हूं जो पार्टी के मुखिया ने पहली सूची में मेरा नाम शामिल किया है। मैं पहले भी बिना डरे, सभी की आवाज उठाता रहा हूं। इंडिया गठबंधन को मजबूत करने और भाजपा को हटाने के लिए जनता वोट करेगी। भाजपा सरकार ने मुसलमानों के साथ यादव और जाटव समाज के लोगों के साथ जुल्म किया है। भाजपा ने सरकारी एजेंसियों का गलत इस्तेमाल किया है। भाजपा सरकार ने लोकतंत्र को खत्म करने का काम किया है। अच्छे शासन के लिए इंडिया गठबंधन को मजबूत करना जनता की जिम्मेदारी है।

डाॅ. बर्क मजबूत दावेदार
सपा के पूर्व जिलाध्यक्ष फिरोज खां ने डॉ. शफीकुर्रहमान बर्क के संभल लोकसभा क्षेत्र से प्रत्याशी बनाए जाने पर खुशी जाहिर की है। साथ ही मिठाई खिलाकर एक दूसरे को बधाई दी। पूर्व जिलाध्यक्ष ने कहा कि डाॅ. बर्क सपा के मजबूत दावेदार हैं। इसलिए पार्टी ने उन पर भरोसा जताया और उन्हें प्रत्याशी बनाया है। अन्य दावेदार इतने मजबूत नहीं थे। पार्टी ने संभल की जनता की मंशा के अनुसार सही निर्णय लिया है।
पोते के विधायक बनने पर लगने लगी थीं टिकट कटने की अटकलें
2022 में कुंदरकी विधानसभा क्षेत्र से डॉ. शफीकुर्रहमान बर्क ने अपने पोते जियाउर्रहमान बर्क को सपा के टिकट पर चुनाव लड़ाया था। उस समय पार्टी ने हाजी रिजवान का टिकट काट दिया था। चुनाव में जियाउर्रहमान को जीत भी मिली थी। इसके बाद माना जा रहा था कि लोकसभा चुनाव में डाॅ. शफीकुर्रहमान बर्क को टिकट नहीं मिलेगा, लेकिन अब इन चर्चाओं पर विराम लग गया।
2019 में थे गठबंधन प्रत्याशी

वर्ष 2014 में संभल सीट से सपा के टिकट पर डॉ. बर्क ने चुनाव लड़ा था। उस समय वह भाजपा प्रत्याशी से हार गए थे। वर्ष 2019 में गठबंधन प्रत्याशी के रूप में चुनाव लड़ा तो छह लाख से ज्यादा मत मिले थे और जीत दर्ज की थी। इस बार गठबंधन में बसपा शामिल नहीं है। ऐसे में डाॅ. बर्क के लिए चुनाव में कड़ी चुनौती रहेगी। यहां सपा, बसपा और भाजपा के बीच त्रिकोणीय मुकाबला हो सकता है।
सांसद के आवास पर मनाई खुशी
संभल के दीपा सराय स्थित सांसद डॉ. शफीकुर्रहमान बर्क के आवास पर मंगलवार रात समर्थकों ने खुशी मनाई। आतिशबाजी कर डाॅ. बर्क के समर्थन में नारेबाजी की। इस दौरान एक दूसरे को मिठाई खिलाकर बधाई दी। सांसद के पोते व कुंदरकी विधानसभा क्षेत्र से विधायक जियाउर्रहमान बर्क समर्थकों के साथ मौजूद रहे। सांसद के दिल्ली से लौटने का समर्थकों को इंतजार है।
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डॉ. बर्क कब-कब लड़े लोकसभा चुनाव
- पहली बार सपा के टिकट पर 1996 में मुरादाबाद लोकसभा क्षेत्र से जीते।
- दूसरी बार सपा के टिकट पर 1998 में मुरादाबाद लोकसभा क्षेत्र से जीते।
- तीसरी बार सपा के टिकट पर 1999 में मुरादाबाद लोकसभा क्षेत्र से चुनाव हारे।
- चौथी बार सपा के टिकट पर 2004 में मुरादाबाद लोकसभा क्षेत्र से जीते।
- पांचवीं बार बसपा के टिकट पर 2009 में संभल लोकसभा क्षेत्र से जीते।
- छठी बार सपा के टिकट पर 2014 में संभल लोकसभा क्षेत्र से हारे।
- सातवीं बार सपा के टिकट पर 2019 में संभल लोकसभा क्षेत्र से जीते।
- आठवीं बार 2024 में सपा ने प्रत्याशी बनाया है।

डॉ. बर्क कब-कब लड़े विधानसभा चुनाव
1967 में पहली बार संभल विधानसभा क्षेत्र से चुनाव हार गए।
1969 में दूसरी बार संभल विधानसभा क्षेत्र से चुनाव हार गए।
1974 में तीसरी बार संभल विधानसभा क्षेत्र से चुनाव जीते।
1977 में चौथी बार संभल विधानसभा क्षेत्र से चुनाव जीते।
1980 में पांचवीं बार संभल विधानसभा क्षेत्र से चुनाव हार गए।
1985 में छठी बार संभल विधानसभा क्षेत्र से चुनाव जीते।
1989 में सातवीं बार संभल विधानसभा क्षेत्र से चुनाव जीते।
1991 में आठवीं बार संभल विधानसभा क्षेत्र से चुनाव हार गए।
1993 में नौवीं बार संभल विधानसभा क्षेत्र से चुनाव हार गए।
2002 में दसवीं बार संभल विधानसभा क्षेत्र से चुनाव हार गए।
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