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Sambhal News: मुश्किल हालात में कभी मां तो कभी पिता बने शिक्षक

Thu, 05 Sep 2024 05:19 AM IST
मुरादाबाद ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, संभल
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संभल। मन के हारे हार है, मन के जीते जीत... लाइन को चरितार्थ करने का दम रखने वाले काफी युवा हैं। जिन्होंने मुश्किल समय से भी प्रेरणा ली और आगे बढ़े। किसी ने अपनी मां को शिक्षक माना तो किसी ने अपने पिता को शिक्षक का दर्जा दिया। शिक्षक तो आदर्श रहे ही हैं। परिवार के सदस्य भी शिक्षक की भूमिका निभा गए और सफलता के मुकाम पर पहुंचकर शिक्षकों की बातें याद करते हैं। शिक्षा दिवस पर ऐसे ही संघर्षशील लोगों से बातचीत की। जिन्होंने अपने शिक्षक व मार्गदर्शक के बारे में बताया। सफलता कितनी मुश्किल से मिली लेकिन शिक्षक और मार्गदर्शकों ने कभी कमजोर नहीं होने दिया। अब सफलता मिली है तो शिक्षक और मार्गदर्शकों की बातें कानों में गूंजती हैं और जहन में घूमती हैं।
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मेरे माता-पिता मेरे मार्गदर्शक रहे हैं। उन्होंने ही मुझे सफलता के लिए प्रेरित किया और मैं तीन बार जब यूपीएससी में पास नहीं हो पाया तो उन्होंने ही मेरी हिम्मत बढ़ाई। उन्होंने कमजोर नहीं होने दिया। लिहाजा मेरे शिक्षक मेरे पिता हैं जो हर कदम पर प्रेरित करते रहे। चौथे प्रयास में 307 रैंक हासिल की और अब आयकर विभाग में हूं। शिक्षक तो मार्गदर्शन करते ही हैं लेकिन माता-पिता की प्रेरणा कमजोर होने नहीं देती है।
शिवांग रस्तोगी, ट्रेनी आयकर अधिकारी, हल्लू सराय, संभल।
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मैंने मुश्किल हालात देखे हैं। मेरे परिवार में कोई अधिकारी नहीं था लेकिन मेरे माता-पिता मुझे पढ़ा रहे थे। मुझे एलएलबी के लिए अलीगढ़ भेजा था और वहां से मेरे मन में जज बनने का सपना जागा। जज बनने की बात जब अपनी मां से कही तो मेरा सपना उनका बन गया। फिर मां चाहती थीं कि मैं जज बनूं। परिवार ने हिम्मत दी थी लेकिन मेरी मां ने मुझे पढ़ने और आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया। मां ही मेरी वह शिक्षक हैं जिन्होंने मुझे कमजोर नहीं होने दिया और मुझे सफलता मिली।
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मोहम्मद कासिम, जज, रूकनुद्दीन सराय, संभल।
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मेरे पापा चाहते थे कि मेरी बेटी खेल के जरिये पूरे देश में नाम रोशन करे। जब खेलना शुरू किया तो हिम्मत बढ़ती चली गई। मेरे काेच शुभदीप सिंह मान ने मेरा हौसला बढ़ाया और कॉमनवेल्थ गेम्स तक का सफर तय किया। शिक्षक हमारे मार्गदर्शक होते हैं उनकी प्रेरणा से ही आगे बढ़ते हैं। मेरे कोच ने भी हमेशा मार्गदर्शन किया। जहां तक भी पहुंची हूं उसका श्रेय मेरे कोच को जाता है। मेरी मेहनत और उनका मार्गदर्शन ही सफलता तक ले गया है।


सरिता सिंह, हैमर थ्रो की राष्ट्रीय चैंपियन, सैदपुर जसकौली, संभल।

मेरे पिता ही मेरे शिक्षक हैं। उन्होंने मुझे दिव्यांग होने के बाद भी प्रेरित किया। उनकी प्रेरणा से ही मैं पैरालंपिक तक पहुंचा। उन्होंने न मेरी हिम्मत कम होने दी और न हौसला खोने दिया। वह हमेशा मेरी हिम्मत बढ़ाते हैं। वह मेरे पहले शिक्षक हैं। उनके मार्गदर्शन से ही पैरा शूटिंग में कई पदक अपने नाम किए हैं।
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दीपेंद्र सिंह, पैरा शूटर, गांव भटपुरा, संभल।
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