चंदौसी। श्रीदेवी गंगा मंदिर का इतिहास करीब 301 वर्ष से अधिक पुराना है। शहर के लोगों के लिए यह मंदिर आस्था का केंद्र है। यहां सालभर धार्मिक अनुष्ठान होते हैं। चैत्र और शारदीय नवरात्रों में श्रद्धालु पूजा-अर्चना करने आते हैं। होली के बाद बसोड़ा पूजन के लिए मेला आयोजित किया जाता है। मान्यता है कि यहां पूजा-अर्चना करने से परिवार में खुशहाली आती है।
खेड़ापति के वंशज मनोज शर्मा बताते हैं कि श्रीदेवी गंगा मंदिर करीब 301 साल पुराना है। यहां मां शीतला देवी की प्रतिमा स्थापित की गई। बताते हैं कि यह प्रतिमा कुएं की खोदाई के समय जमीन से निकली थी। उनके वंशजों के अनुसार कैथल गेट पहले बंजारों के ठहरने का स्थान हुआ करता था। यह स्थान ऊंचाई पर होने के कारण बारिश के दिनों में बंजारे आकर रुकते थे। पानी की जरूरत पूरी करने के लिए वह कुएं खोदते थे।
एक दिन खोदाई के दौरान मां शीतला देवी प्रतिमा निकली थी। बंजारों ने छोटी सी मड़ैया बनाकर प्रतिमा को स्थापित कर दिया। इसके बाद पूजा-अर्चना करने लगे। कुछ समय बाद जब बंजारे गए तो माता रानी की पूजा-अर्चना व सेवा की जिम्मेदारी खेड़ापति को सौंप दी गई। इसके बाद से ही खेड़ापति के वंशज शीतला माता की पूजा-अर्चना करते चले आ रहे हैं। होली के बाद मंदिर पर बसोड़ा का मेला लगता है। वहीं नवरात्र पर पूजा-अर्चना करने वाले श्रद्धालुओं की भीड़ रहती है। समय समय पर मंदिर में धार्मिक आयोजन होते रहते हैं।
मंदिर के आसपास थे 16 कुएं
पहले बंजारे आकर पानी की आवश्यकता होने पर कुएं खोदते थे। जहां मंदिर है, उसके आसपास बंजारों ने 16 कुएं स्थापित किए थे। हालांकि बाद में आबादी बढ़ती गई और अधिकांश कुएं बंद कर दिए गए। कुछ कुएं रह गए हैं। यहां मांगलिक कार्यक्रम होने पर महिलाएं कुओं पर पूजा-अर्चना करने आती हैं।