सिरसी। पैगंबर-ए-इस्लाम नबी-ए-करीम के दामाद मौलाए कायनात हजरत अली की यौमे शहादत सिरसी में रंजो गम के साथ मनाई गई। इस दौरान मस्जिदों और अजाखानों में मजलिसें हुईं। इमाम बारगाह एवं मस्जिदों में शबीहे ताबूत निकाले गए। जिसमें मातमी अंजुमनों ने मातम व नोहाख्वानी करके मौला अली को खिराजे अकीदत पेश की।
कस्बे में शिया समाज के द्वारा तीन दिवसीय यौमे गम के तीसरे दिन बुधवार 21 वीं रमजान पर दामादे पैगंबर हजरत अली की यौमे शहादत मनाई गई। हजरत अली की शहादत के गम में अजाखानों में शबीहे ताबूत निकाले गए। मजलिसों में मौलानाओं ने हजरत अली की सीरत पर रोशनी डालते हुए कहा कि अली दुनिया के वाहिद शख्स हैं, जिनकी विलादत काबे में और शहादत मस्जिद में हुई।
अली इल्म का खजाना थे। खुद पैगंबर ने कहा था कि मैं शहरे इल्म हूं और अली उसका दरवाजा। उलेमाओं ने कहा कि यदि पैगंबर को समझना है, तो पहले अली को समझना होगा। अली ने दुनिया को उसूले जिंदगी सिखाए। उनके मुखालिफ भी उनकी ईमानदारी, सखावत शुजाअत का लोहा मानते थे। उन्होंने कहा कि अली की तालीमात पर अमल करके हम दीन और दुनिया में कामयाबी हासिल कर सकते हैं।
तीन दिन तक चली मजलिसों को शिया जामा मस्जिद के इमाम मौलाना हसीन अख्तर जैदी, मस्जिद सादात के इमाम मौलाना मीसम अब्बास, इसके अलावा मौलाना काजी हुसैन रजा, एहतेशाम अली, कमर अब्बास कंबर, सफी असगर नजमी, मौलाना मोहम्मद अब्बास, मौलाना इकरार रजा, मौलाना शादाब मेहंदी जाफरी, मौलाना फैजान, मौलाना शमीम आदि ने भी खिताब फरमाया। इसी के साथ शिया समुदाय में तीन दिवसीय शोक खत्म हो गया।