चंदौसी (संभल)। मेला गणेश चौथ की इस वर्ष 65वीं वर्षगांठ मनाई जा रही है। मेला गणेश चौथ सांप्रदायिक सौहार्द और गंगा जमुनी मिसाल के लिए भी प्रसिद्ध है और सर्वधर्म संभाव की मिसाल कायम किए है। मेले का उद्घाटन भी चारों धर्मों के प्रतिनिधि करते हैं। मेला इंचार्ज रविंद्र कुमार रूपी ने बताया कि इस बार 65वां मेला गणेश चौथ का आयोजन किया जा रहा है। मेला का उद्घाटन 25 अगस्त को हिंदू, मुस्लिम, सिख व ईसाई धर्म के साथ बौद्ध धर्म के प्रतिनिधि करेंगे। मेले की शुरुआत डॉ. गिरिराज किशोर ने की थी। शुरुआत में मेला गणेश मंदिर से सीता आश्रम तक लगता था। मेले में सभी धर्मों के लोगों की सहभागिता रहती है। जब 1984 में मेला सीता रोड से इंदिरा मार्ग पर स्थित मैदान में आया तो मेला संस्थापक ने चारों धर्मों के प्रतिनिधियों से मेले का उद्घाटन कराने शुरुआत की थी। मेले के मुख्य द्वार पर चारों धर्मों के प्रतिनिधियों की स्टेच्यू लगाई जाती है।
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कौमी एकता
कौमी एकता परिषद की ओर से सभी धर्म के लोग हर साल गणेश चतुर्थी पर ठेले पर बूंदी का लड्डू और पोशाक रख कर कीर्तन करते हुए गणेश मंदिर पहुंचते हैं और गणपति बप्पा को पोशाक चढ़ाने के साथ बूंदी के लड्डू का भोग लगाते हैं। अब तक सवा क्विंटल बूंदी के लड्डू का भोग लगाया जाता रहा है।
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खान बाबा की मजार पर होती है चादरपोशी
सांप्रदायिक सौहार्द की मिसाल बने मेला गणेश चौथ की ख्याति दूर-दूर तक प्रसिद्ध है। मेले में धार्मिक कार्यक्रमों का आयोजन भी लंबे समय से किया जा रहा है। वहीं मेले के दौरान मेला ग्राउंड के पास बनी असतुल्ला खान बाबा की मजार पर चादरपोशी भी की जाती है। श्री गणेश मेला परिषद के तत्वावधान में ढोल नगाड़ों के साथ गणेश मंदिर से सभी धर्मों के लोग चादर लेकर खान बाबा की मजार पर पहुंचते हैं। जहां विधि विधान से खान बाबा की मजार पर चादरपोशी करते हैं। साथ ही मुस्लिम समाज के लोगों को सम्मानित भी किया जाता है।
मुशायरा और कव्वाली का भी होता है आयोजन
मेला गणेश चौथ में प्रतिदिन सांस्कृतिक कार्यक्रमों की धूम रहती है। यहां कवि सम्मेलन के अलावा मुशायरा और कव्वाली का भी आयोजन किया जाता है। जिसमें देश के नामचीन शायर व कव्वाल कलाम पेश करते हैं। श्रोताओं की बढ़चढ़ कर भागीदारी रहती है।