कई डेयरी संचालक दूध के बदले बंद हो चुके पुराने नोटों से भुगतान कर रहे हैं और किसान इन रुपयों को अपने खाते में डालते हैं या कुछ 500 रुपये का नोट 400 रुपये में चलाते हैं।
संभल जिले के तकरीबन प्रत्येक गांव में दूध डेयरियों का नेटवर्क फैला हुआ। दूध के बदले किसानों को इस वक्त 500-500 के पुराने नोट दिए जा रहे हैं। एक अनुमान के मुताबिक एक दिन में एक करोड़ रुपये से अधिक की पुरानी करेंसी दूध डेयरियों के माध्यम से खपाई जा रहा है।
जनपद में दूध डेयरियों के माध्यम से एक करोड़ रुपये प्रतिदिन खपाए जाने का अनुमान है। कई डेयरी संचालक दूध के बदले बंद हो चुके पुराने नोटों से भुगतान कर रहे हैं और किसान इन रुपयों को अपने खाते में डालते हैं या कुछ 500 रुपये का नोट 400 रुपये में चलाते हैं।
जो लोग रुपये लेने से मना करते हैं उनसे कहा जाता है कि दूथ देना है तो दें न देना है तो घर ले जाएं। ऐसे में किसान पुराने नोटों पर अपना दूध देने पर मजबूर हो गए हैं। कोई 400 रुपये में नोट चला रहा है तो कोई बैंक में रुपये जमा कर रहा है।
भदरौला गांव में 99 प्रतिशत किसान दूध बेचते हैं। यही स्थिति आसपास के तमाम गांवों की है। बड़ा ताजउद्दीन, सलखना, सिरसानाल, लखौरी, भारतल, सिंहपुरसानी, मन्नी खेड़ा, मेहराना, रंपुरा, महमूदपुर कुंज, चंदावली, भतावली, रिठाली, गैलुआ, कल्यानपुर, कुरकावली, देहपा, चितावली, ऐचवाड़ा डींगर में दुधारू पशुओं का पालन करते दूध बेचने का काम कुटीर उद्योग की तरह चलता है। इन गांवों में दिल्ली से बुलंदशहर तक की डेयरियों के कलेक्शन सेंटर हैं।
हजारों लीटर दूध टैंकरों के माध्यम से दिल्ली तक जाता है। दूध की खरीद के बदले 1000 व 500-500 रुपये के पुराने नोट दिए जा रहे हैं। दूध बेचने वाले किसान अगर नए नोट मांगते हैं तो दूध कलेक्शन सेंटर के कर्मचारी टका से जवाब देते हैं कि हमारे पास नए नोट नहीं है। दूध देना है तो दीजिए।
भाकियू ने उठाए सवाल-कहां जा रहे दूध बिक्री के रुपये
सिंहपुरसानी (संभल)। भदरौला गांव के किसान और भाकियू असली के जिला महासचिव संजीव गांधी ने इस हालात को लेकर सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि दिल्ली में तो दूध-पनीर और घी आदि नगद में बिक रहा है। नगद बिक्री का पैसा कहां जा रहा है? यह सवाल अहम है। उन्होंने कहा कि किसान पुराने नोट को लेने से मना कर सकते थे लेकिन यहां पर एक डेयरी को छोड़कर सभी डेयरियां पुराने नोट ही दे रही हैं। एक डेयरी बैंक खाते में भुगतान दे रही है।
इससे किसानों के सामने नगद की समस्या रहती है। मजबूरी में किसान अपना दूध पुराने नोटों पर ही बेच रहे हैं। उनका कहना है कि जनपद में एक दिन में कम से कम एक करोड़ रुपये के पुराने नोट दूध की खरीद करके खपाए जा रहे हैं। यदि सरकारी तंत्र इस पर जांच कराए तो किसानों का भला हो सकता है।
बोले पशुपालक
इस सप्ताह में 800 रुपये का दूध बेचा था। दूध डेयरी वाले ने 1000 का नोट दिया है। बाजार गई तो 800 रुपये में नोट चला। नोट बंदी के परिवार का पालन पोषण होने में भी बहुत परेशानी हो रही है। - डिप्पल, भदरौला निवासी
इस सप्ताह 300 रुपये का दूध बेचा था। डेयरी वाले ने 500 का नोट दिया। 500 का नोट लेकर बाजार से सामान लेने के लिए गए तो दुकानदार ने 400 रुपये में लिया। 400 रुपये का ही सामान लेकर वापस लौट आया। - अमन, भदरौला, निवासी
इस बार 900 रुपये का दूध बेचा था। डेयरी वाले ने 500-500 के नोट दिए। नोटों को संभल से कपड़े खरीदने के लिए गई तो दुकानदार ने वह हजार रुपये 800 रुपये में लिए। - राजबाला, भदरौला, निवासी
नोटबंदी ः ट्रांसपोर्ट कारोबार पर असर, 4 हजार ट्रकों के पहिए थमे
मैंथा और हैंडीक्राफ्ट इंडस्ट्री के बाद अगर कोई बड़ा कारोबार संभल में है तो वह है ट्रांसपोर्ट का। अब इस कारोबार पर भी बड़ा नोटबंदी का असर है। सरकार ने पेट्रोल पंपों पर 2 दिसंबर से 500 रुपये के नोट लेना बंद करा दिया है। ट्रांसपोर्ट इंडस्ट्री इसके चलते सबसे ज्यादा प्रभावित हुई है।
अकेले संभल में 4000 से अधिक ट्रक हैं। इस इंडस्ट्री में 10,000 से अधिक रोजगार पाए हुए हैं। ट्रांसपोर्टरों ने बताया कि 8 नवंबर को नोट बंद हुए लेकिन तत्काल ट्रांसपोर्ट इंडस्ट्री पर कोई असर नहीं पड़ा लेकिन 18 नवंबर के बाद ट्रांसपोर्ट व्यवसाय पर असर आना शुरू हुआ है। 18 नवंबर के बाद से ट्रांसपोर्ट कारोबार को प्रतिदिन एक करोड़ रुपये की क्षति हो रही है क्योंकि विभिन्न फैक्ट्रियों में उत्पादन प्रभावित है। देश और विदेश में आर्डर कम मिल रहे हैं। संभल के प्रमुख ट्रांसपोर्टरों में शामिल हाजी परवेज ने बताया कि एक दिन में संभल की ट्रांसपोर्ट इंडस्ट्री को एक से डेढ़ करोड़ रुपये का नुकसान हो रहा है।
अब 500 के नोट से डीजल न मिलने का जो फैसला लिया गया है उसके बाद सैकड़ों गाड़ियों के पहिए थम गए हैं। दूसरे ट्रांसपोर्टर असद हुसैन ने बताया कि नोटबंदी से पहले वह 20-25 गाड़ियां एक दिन में लोड कराते थे लेकिन अब दो चार गाड़ियां ही जाती हैं। उन्होंने बताया कि हड्डी सींग, मीट इंडस्ट्री में सैकड़ों गाडियां चलती थीं। फैक्ट्रियों में उत्पादन ठप होने से कारोबार ठप हो गया है। ट्रकों के पहिए थम गए हैं जो थोड़ा बहुत काम मिल रहा था अब 500 के नोट से डीजल मिलने पर लगी पाबंदी से वह भी खत्म हो जाएगा।