सुप्रसिद्ध कवि एवं गीतकार डा.कुमार विश्वास ने कल्कि के मंच पर अपनी कविताओं से रंग जमा दिया। सबसे पहले उन्होंने अपने कविता पाठ की शुरूआत अपनी सुप्रसिद्ध रचना से की। कोई दीवाना कहता है, कोई पागल समझता है। दो पंक्तियां सुनते ही पंडाल में उपस्थित श्रोताओं में जोश भर गया और वे झूम उठे।
इसके बाद उन्होंने एक एक करके कई रचनाएं सुनाईं। इतनी रंग बिरंगी दुनिया दो हाथों में कैसे आए। हमसे पूछो इतने अनुभव एक कंठ से कैसे गाएं। इसके बाद उन्होंने सुनाया-एशिया के हम परिंदे, आसमां है हद हमारी, जानते हैं चांद सूरज जिद हमारी-जद हमारी, हम हैं देशी, हां मगर, हर देश में छाए हैं मगर।
इस कविता के साथ देश के गौरव को बढ़ाते हुए उन्होंने हास्य और व्यंग के श्रंगार रस की कई कविताएं सुनाईँ। देर रात्रि तक श्रोता जमे रहे। संभल ही नहीं मुरादाबाद और रामपुर के साथ अमरोहा तक के श्रोता उन्हें सुनने आए थे। रत्रि करीब 11.30 बजे कल्कि महोत्सव के मंच पर पहुंचे।
पंडाल में उपस्थित लोगों ने उनका जोरदार तरीके से स्वागत किया। आचार्य प्रमोद कृष्णम भी उनके साथ थे। कवियत्री ममता शर्मा ने अपनी कविता के माध्यम से कृष्ण भक्ति का नया राग छेड़ा। उन्होंने मीरा की भक्ति को भी नमन किया।
उनकी रचना थी- मीरा ने मूरत को जो सुलाया तो नटखट जाग के सो गया होगा, गोद के स्पर्श में मोद को पाकर पाहन, मीरा ने प्रेम की जो बेल बोई तो कान्हा भी अंकुर बो गया होगा। मीरा ने आंसू के मोती सजाए तो कान्हा भी धागा पिरो गया होगा।
पद्म श्री सुरेंद्र दुबे ने अपनी रचनाओं के माध्यम से राहुल गांधी और लालकृष्ण आडवाणी पर व्यंग किए। उन्होंने अपनी रचना में कहा- हे भगवान किसी को ऐसी सजा मत देना, राहुल जैसी जवानी और आडवाणी जैसा बुढ़ापा। उन्होंने कई रचनाओं के माध्यम से श्रोताओं का दिल जीता।