हर साल 10-15 बाल विवाह होते हैं। इस साल भी कुछ नाबालिकों की शादियां तय हैं। तैयारी चल रही है। लगन खुलने का इंतजार है। हैरत की बात यह है कि इस गैरकानूनी शादियों में मां-बाप, बड़े-बुजुर्गों सभी सहमति होती है। कोई विरोध नहीं करता। मामले पुलिस तक नहीं जाते हैं।
ग्रामीण बताते हैं यहां तो यही परंपरा है, जब रिश्ता मिल जाए तब शादी कर लो। उम्र कितनी है इस पर यहां ज्यादा ध्यान नहीं दिया जाता।
हाल के वर्षों में सिर्फ इतना फर्क आया है कि पहले जहां 10-12 वर्ष की आयु में विवाह हो जाया करते थे अब 14-16 वर्ष की उम्र में विवाह हो रहे हैं। केशोपुर भंडी में बीते साल चार बाल विवाह हुए हैं।
बाल विवाह के ये हैं कारण
जिन गांवों में बाल विवाह के मामले सामने आ रहे हैं, वहां आमतौर पर लोगों का पढ़ाई लिखाई के प्रति रूझान नहीं है। केशोपुर भंडी में चार और अझरा में दो बाल विवाह इसी वर्ष हुए हैं। तीन हजार की आबादी वाले केशोपुर गांव में शिक्षा का स्तर कैसा रहा है इसको सिर्फ इतने से समझ सकते हैं कि गांव में कोई भी सरकारी नौकरी में नहीं है। एक शिक्षामित्र कमल सिंह को शिक्षक पद पर समायोजित किया गया है।
आठवीं कक्षा के बाद यहां बेटियों को पढ़ाने में कोई रुचि नहीं है। अशिक्षा के चलते बाल विवाह अधिक होते हैं। दूसरी वजह गरीबी की है।
रहता है अंदेशा, कहीं बिगड़ न जाएं बच्चे
गांव की महिलाओं से जब बाल विवाह के संबंध में बातचीत की गई तो उनका कहना था कि जमाना बदल गया है। अब शादी ब्याह की बातें बच्चे 12-14 वर्ष में ही जानने लगते हैं। बच्चों के बिगड़ने का अंदेशा रहता है, इसलिए जितनी जल्दी शादी हो जाए उतना ही अच्छा है।
गांव के लोगों ने बताया कि यदि एक वर्ष के अंदर हुई शादियों का रिकार्ड निकलवा लिया जाए तो 18 वर्ष और 21 वर्ष की उम्र का मानक कम ही शादियों में पूरा हुआ होगा।