सरायतरीन (संभल)। गांव दिलगौरा में चल रही श्रीकृष्णलीला के सातवें दिन जलंधर वध का प्रसंग सुनाया। कथाव्यास हरिद्वारी महाराज ने बताया कि अहंकार ज्यादा दिन नहीं टिकता, उसका अंत निश्चित है। मनुष्य को अहंकार नहीं करना चाहिए। सिर्फ भगवान की भक्ति में मनुष्य को जीवन व्यतीत करना चाहिए।
कथाव्यास ने बताया कि महादेव ने गुरु बृहस्पति के अनुरोध पर इंद्र के प्राणों की रक्षा के लिए अपनी क्रोधाग्नि को समुद्र में डाल दिया। यह ऐसा स्थान था, जहां समुद्र और गंगा का मिलाप होता है। इसे ही गंगासागर कहा जाता है। शिवजी के क्रोधाग्नि से समुद्र से एक बालक की उत्पत्ति हुई। बालक के रोने की ध्वनि इतनी तेज थी कि इसे सुनकर सम्पूर्ण संसार बहरा हो गया। तब सभी देवता ब्रह्माजी के पास पहुंचे। ब्रह्माजी भी बालक की ध्वनि को सुनकर समुद्र के पास पहुंचे और उन्होंने बालक को गोद में उठा लिया। बालक ब्रह्माजी की गोद से लिपट गया और रोने लगा। ब्रह्माजी ने बालक का नाम सिंधु पुत्र जलंधर रखा। इसके बाद शुक्राचार्य को बुलाकर जलंधर का राज्याभिषेक भी कराया गया। जलंधर का विवाह वृंदा के साथ हुआ। वृंदा कालनेमि असुर की पुत्री थीं। वृंदा भले ही असुर की पुत्री थीं, लेकिन वह भगवान विष्णु की परम भक्त थीं। जलंधर आगे चलकर असुरों का शासक बना गया। इस कारण जलंधर को अभिमान हुआ और वह संसार में आतंक मचाने लगा। महादेव ने जलंधर का वध करके यह संदेश दिया कि घमंड एक न एक दिन खत्म हो जाता है। इसलिए घमंड नहीं करना चाहिए। इस दौरान रामनिवास यादव, महीपाल सिंह, राजपाल सिंह, कायम सिंह, राजकुमार, शिवकुमार यादव, हीरालाल, प्रेमपाल सिंह, विकास यादव आदि रहे।