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पेड़ पर बने मचान पर लगी आग, दो मासूम जिंदा जले

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जुनावई/चंदौसी।
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गुन्नौर कोतवाली क्षेत्र में खेतों में फसलों की रखवाली करने के लिए बनाए गए मचान में सोमवार को अचानक आग लग गई। जिस पर खेल रहे तीन बच्चे आग में फंस गए। जिसमें एक बालिका को नीचे बैठी उसकी बडी बहन ने खींच लिया लेकिन दो सगे मासूम भाइयों की जिंदा जलकर मौत हो गई। घटना से क्षेत्र में खलबली मच गई है। दोनों शवो को पोस्टमार्टम के लिए भेजा गया है।
गुन्नौर कोतवाली क्षेत्र के बझांगी ग्राम पंचायत के मजरा उदिया नगला गांव निवासी प्रेमपाल के बीमार हो जाने के बाद उसकी पत्नी बादामश्री ने खेत खलिहान का काम संभाला। बताते है कि सोमवार की सुबह बादामश्री अपने आठ वर्षीय बेटे ललतेश एवं पांच वर्षीय बेटे संजू को लेकर खेत पर पहुंची। काटे गए गेहूं पुलियों को एकत्र करना था। धूप अधिक थी, इसलिए उसने अपने दोनों बच्चों को खेत में ही पेड़ पर चारपाई बांधकर ऊपर झोपड़ी डालकर बनाए गए मचान (टांड़) पर भेज दिया। उसी समय उसके देवर कुंवर पाल को दो बेटिया पांच वर्षीय बबिता एवं छह वर्षीय राजेश्वरी खेत पर पहुंच गई।
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वह दोनों बालिकाएं भी मचान पर पहुंच गई। बताते हैकि बबिता तो मचान पर चढ़ गई लेकिन राजेश्वरी उसके नीचे ही खेत में बैठ गई। बच्चे मचान पर गए तो बादामश्री करीब पचास मीटर की दूरी पर गेहूं की पूलियां एकत्र करने में जुट गई। बताते हैकि मचान पर पहुंचने कुछ देर बाद संजू सो गया। ललतेश व बबिता खेलते रहे। करीब साढ़े ग्यारह बजे मचान के छप्पर में आग की लपटें उठने लगी।
बच्चों ने चीखना चि ल्लाना शुरू किया तो बादाश्री भी दौड़ी। लेकिन इसी बीच नीचे बैठी राजेश्वरी ऊपर चढ़ी और अपनी बहन बबिता को खींच कर नीचे उतार लाई। अभी बादामश्री मचान पर चढ़ ही रही थी कि संजू जलते हुए नीचे गिरा। इसी दौरान ललतेश को बचाने के लिए उसकी मां दौडी तो आग लपटे उसी तरह हो गई, जिस तरफ चढ़ने का रास्ता था। उसने कभी मिट्टी डाली तो कभी पानी फेंका लेकिन आग धधकती रही।
शोर शराबे की आवाज सुनकर पड़ोसी खेत स्वामी राम खिलाड़ी सिंह रामपाल, सतीश, वीरेश आदि दौडकर पहुंचे। आग बुझाने को बुझाने का प्रयास किया। राम खिलाड़ी ने जलते हुए आग से ललतेश को निकाल लिया। लेकिन इसी बीच नीचे गिरे संजू की मौके पर ही मौत हो गई थी। क्योंकि वह वह जलकर गिर रहे घास फूस के बीच में ही गिर गया था। ललतेश को किसी तरह निजी चिकित्सालय ले जाया गया।
वहां से अलीगढ़ रेफर किया गया। वह अस्सी फीसदी झुलस चुका था। अलीगढ़ पहुंचते पहुंचते ही ललतेश की भी मौत हो गई। सूचना मिलने पर गुन्नौर के एसएसआई बृजपाल सिंह मौके पर पहुंचे। दोनों शवों का सील कर पंचनामा भरकर पिता प्रेमपाल की मांग पर पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया है।आग बुझाने के प्रयासों में बादामश्री के हाथ में झुलस गए हैं।

कुछ नहीं कर सकी मां
जुनावई। मां के सामने उसके दोनों लाड़ले आग की लपटों में जलकर मर गए और वह कुछ नहीं कर सकी। यह मलाल है कि बादामश्री को। घर में बीमार पड़े प्रेमपाल को भी यह मलाल हैकि काश वह बीमार नहीं होता, तो उसके दोनों लाड़ले ऐज जीवित होते, क्योंकि वह सायद उन्हें धूप में खेतों पर जाने ही नहीं देता। प्रेमपाल ने कहा कि मेरे चार बेटों में से मात्र दो ही बेटे बचे हैं। जबकि मेरा आठ वर्षीय बेटा ललतेश, बझांगी गांव में प्राथमिक विद्यालय में कक्षा दो में शिक्षा गृहण कर रहा था। और छोटे बेटे संजू का भी इस बार मैं स्कूल में नाम लिखवाना चाह रहा था। सभी अरमान मेरे धरे रह गए।

छह साल की मासूम ने अदम्य साहस से अपनी सगी बहन मौत से छीना
जुनावई/चंदौसी।
छह साल की साहसी राजेश्वरी ने आग की भयंकर लपटो का सामना करने हुए भी अपनी छोटी बहन को जीवित बचा लिया। अपनी बहन को नीचे छोड़कर अपने दोनों तहेरे भाइयों को बचाने के लिए भी मासूम बालिका ने पूरी कोशिश की लेकिन लपटे उसी ओर आ चुकी थी, जहां से चढ़कर वह अपनी बहन को बचाने में सफल हुई थी।
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मचान पड़े पर बना था, हवा भी चल रही थी। सूर्य आग बरसा रहा था। सामने उसकी सगी बहन व दो तहेरे भाई मौत की लपटों से घिरे थे। उम्र सिर्फ छह साल होने के बावजूद वह राजेश्वरी घबरा कर भागी नहीं, बल्कि अदम्य साहस दिखाते हुए सब कुछ जलाकर राख कर देने को आमादा लपटो से टक्कर लेने मचान पर चढ़ने लगी। लपटे उसके सिर टकराई, उसकी बाल जला दिए लेकिन छह साल की राजेश्वरी ने हिम्मत नहीं हारी और मचान तक पहुंचकर अपनी पांच साल सगी बहन बबिता को मौत के मुंह से खींच लिया। उसे पकडकर शकुशल नीचे उतार लाई। उसे दूर भगा दिया। उसके बाद फिर उसने हिम्मत दिखाई, फिर मचान पर चढ़कर अपने चचेरे भाइयों को बचाने का प्रयास किया, इसी बीच उसकी ताई बादामश्री भी पहुंच चुकी थी, लेकिन दोनों भाई में गिर चुके थे। बचने की कोशिश में संजू नीचे गिर गया और उसके बाद घिरे ललतेश को गांव के ही राम खिलाड़ी ने बाहर निकाला। यदि राजेश्वरी घबरा कर भाग जाती या मचान पर चढ़ने में थोड़ी सी भी देर कर देती तो बबिता भीा जिंदा जल सकती थी।
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