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उत्तम आकिंचन्य धर्म की आराधना की गई

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श्री दिगंबर जैन मंदिर में उत्तम आकिंचन्य धर्म पर पूजा अर्चना करते जैन मुनि व समाज के लोग - फोटो : SAHARANPUR
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उत्तम आकिंचन्य धर्म की आराधना की गई
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सहारनपुर। जैन बाग स्थित प्राचीन दिगंबर जैन मंदिर में पर्यूषण पर्व के नौंवे दिन उत्तम अकिंचन धर्म की आराधना की गई। जैन समाज के लोगों ने श्रद्धाभाव से पूजा अर्चना की।
बृहस्पतिवार को प्रभु श्रीजी का अभिषेक एवं शांतिधारा करने का सौभाग्य अनिल जैन, रवि जैन, विनोद जैन, विपिन जैन व नवीन जैन को मिला। आचार्य ज्ञेयसागर महाराज ने कहा कि अकिंचन अर्थात कुछ भी मेरा नहीं है, मैं मात्र आत्मा हूं। इसके अतिरिक्त जो कुछ भी है, वह सब पर द्रव्य है। जैन दर्शन में पर-वस्तु को ग्रहण करना और अपना मानना परिग्रह है। बाह्य सामग्री के साथ-साथ भावों को भी परिग्रह कहा है। राग-द्वेष के कारण पदार्थों में जो ममत्व-आसक्ति है, वही परिग्रह है। वस्तु में आसक्ति का भाव परिग्रह है। उत्तम आकिंचन्य धर्म के धारी तो महामुनिराज हैं, जिनके पास तिल मात्र भी परिग्रह नहीं होता। उन्होंने सभी को परिग्रह के त्याग की प्रेरणा दी।
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ज्ञेय सागर महाराज ने कहा कि जैसे लोभ व कषाय का अभाव होने पर उत्तम शौच धर्म प्रकट होता है, उसी प्रकार परिग्रह का अभाव होने पर आकिंचन्य धर्म का जन्म होता है। आत्मा के अतिरिक्त जो पर पदार्थ है, उन्हें अपना मानना परिग्रह है। अनन्त ज्ञान शक्ति से परिपूर्ण आत्मा ही मेरा है, ऐसा मानना और जानना ही आकिंचन्य धर्म है।
जैन समाज के अध्यक्ष राजेश जैन ने कहा कि समस्त पापों का मूल कारण परिग्रह ही है। समस्त पाप लोभ के कारण होते हैं। लोभ परिग्रह के कारण होता है। परिग्रह में आसक्ति होने के कारण मानव अन्याय, अनीति, अनैतिक, अविधिक तरीके से द्रव्य अर्जित करने में संकोच नहीं करता, जो पाप के साथ-साथ अपराध को भी जन्म देता है।
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इस दौरान मनीष जैन, अनिल जैन, चौधरी अनुज जैन, संदीप जैन, मुकेश जैन, अशोक जैन, अजय जैन, नरेश, नितिन जैन, विपुल जैन, अभिषेक जैन, नीरज जैन, पंकज, राकेश, संजय, संजीव, बालेश, श्रेयांश जैन, संयम, शौर्य, नमन, प्रकाम, तरुण मौजूद रहे।
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