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शहीदों को जनता ने सिर आंखों पर बैठाया, सरकार ने भुलाया

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शहीद के पिता चौ रणजीत सिंह - फोटो : SAHARANPUR
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सहारनपुर। पाकिस्तान के साथ वर्ष 1999 में आठ मई से 26 जुलाई तक चले कारगिल युद्ध में जिले से भी भारतीय सेना के वीर जवानों बहरामपुर के बिंदरपाल सिंह और जेहरा के राजेश बैरागी ने अपना बलिदान देकर भारत माता का मस्तक गर्व से ऊंचा किया था। उस वक्त सरसावा एयरफोर्स स्टेशन पर तैनात चार वायुसेना अधिकारियों ने भी अपना बलिदान देकर इस युद्ध में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। समय बीतने के साथ ग्रामीणों के दिलों में तो इन शहीदों की अमरगाथा और अमिट होती गई, लेकिन सरकारी मशीनरी ने इनकी शहादत को भुला दिया।
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बिंदरपाल सिंह 23 की उम्र में हो गए थे शहीद
विकास खंड साढ़ौली कदीम के यमुना तटवर्ती गांव बहरामपुर में एक जनवरी 1976 को साधारण किसान परिवार में जन्मे बिंदरपाल सिंह को कारगिल युद्ध के दौरान 17 जून 1999 को युद्ध के मैदान में पुंछ सेक्टर भेजा गया था। जहां 12 दिनों तक युद्ध के मैदान में डट कर दुश्मनों से टक्कर लेते रहे। 29 जून को मातृभूमि की रक्षा करते हुए भारत माता का यह सपूत शहीद हो गया।
पिता की पीड़ा शहादत के बाद नहीं ली किसी ने सुध
शहीद के पिता चौ. रणजीत सिंह का कहना है कि बिंदरपाल की शहादत के समय अफसरों ने बड़े बड़े वादे किए थे, लेकिन बाद में किसी ने सुध नहीं ली। गांव के संपर्क मार्ग पर शहीद द्वार बनाने की मांग आज तक पूरी नहीं हो सकी है। शहीद के भाई चौ. मगनपाल सिंह कहते हैं कि बिंदरपाल के नाम पर संचालित उच्च प्राथमिक विद्यालय को इंटर कॉलेज बनाने को लेकर कई बार विभागीय अधिकारियों से गुहार लगा चुके हैं, लेकिन कोई सुनवाई नहीं हुई। शहीद के नाम पर बनाए गए संपर्क मार्ग की हालत भी खस्ता है।
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दुश्मनों के दांत खट्टे कर शहीद हुए थे राजेश बैरागी
गंगोह के गांव जेहरा में एक अगस्त 1968 को ताराचंद बैरागी के घर जन्मे राजेश बैरागी ने 8 सितंबर 1988 में सेना ज्वाईन की थी। सात जुलाई 1999 को पैराशूट रेजीमेंट के लांसनायक राजेश बैरागी कारगिल युद्ध में दुश्मनों के दांत खट्टे करते हुए शहीद हो गए थे। उनके अंतिम संस्कार के वक्त तत्कालीन अफसरों ने गंगोह के सहारनपुर बस अड्डा चौक पर उनकी प्रतिमा लगाने और गंगोह-वजीरपुर मार्ग का नामकरण भी उनके नाम पर करने की घोषणा की थी। प्रशासन ने मात्र गंगोह वजीरपुर मार्ग पर उनके नाम का शिलापट लगाकर अपनी जिम्मेदारी पूरी कर ली। उक्त शिलापट भी लापरवाही के चलते अब गायब हो चुका है। पिता ताराचंद बैरागी ने बेटे की शहादत के बाद गांव में उनका समाधी स्थल बनवाया था। यहां उनकी प्रतिमा भी लगाई गई है।
मुफलिसी से लड़ते हुए दम तोड़ गए माता पिता
गंगोह। कारगिल शहीद राजेश बैरागी के वयोवृद्ध एवं अस्वस्थ माता-पिता बेहद गरीबी और लाचारी का जीवन जीने को मजबूर थे। शहीद के भाई राकेश बैरागी ने बताया कि पिता ताराचंद बैरागी और माता कांति देवी को मिलने वाली पेंशन कभी समय से नहीं मिली। कई बार तो आठ से नौ माह बाद पेंशन मिली। ऐसे में उन्होंने मुफलिसी से लड़ते हुए दम तोड़ दिया था। शहीद की पत्नी कमलेश शहादत के बाद अपने दोनो बच्चों को उच्च शिक्षा दिला कर काबिल बनाने के लिए गांव छोड़ यमुनानगर में बस गई थीं। बेटा रजत लॉ की पढ़ाई पूरी कर वकालत कर रहा है। बेटी की शादी हो चुकी है। वह कभी कभी ही गांव आते हैं।
सरसावा स्टेशन के चार वायु सेना अधिकारी हुए थे शहीद
28 मई 1999 को सरसावा वायुसेना स्टेशन की माईटी आर्मर यूनिट के चार बहादुर अधिकारी स्क्वाड्रन लीडर राजीव पुंडीर, फ्लाइट लेफ्टिनेंट एस मुहिलन, फ्लाइट गनर सार्जेंट पीवीएनआर प्रसाद, फ्लाइट इंजीनियर सार्जेंट आरके साहू एमआई-17 युद्धक हेलिकॉप्टर से उड़ान भरकर कारगिल के बर्फीले युद्ध क्षेत्र में पहुंचे थे। जहां वे तोलोलिंग की ऊंची बर्फीली चोटियों पर काबिज दुश्मन पर जबरदस्त फायरिंग करते हुए साथियों को रसद पहुंचाने के दौरान दुश्मन की मिसाइल की चपेट में आकर वायुसेना की उच्चतम परंपराओं को अक्षुण्ण रखते हुए वायु योद्धा के सर्वोच्च सम्मान वीरगति को प्राप्त हुए थे।

शहीद राजेश बैरागी- फोटो : SAHARANPUR

शहीद राजेश बैरागी के समाधि स्थल पर लगी प्रतिमा- फोटो : SAHARANPUR

शहीद बिंदरपाल सिंह- फोटो : SAHARANPUR

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