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Saharanpur News: न बिजली, न पानी, व्यवस्था की भेंट चढ़ गईं कई पीढि़यां

Wed, 06 Dec 2023 12:34 AM IST
मेरठ ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, सहारनपुर
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पहाड़ियों की तलहटी में इस तरह की झोपड़ियों में रहते हैं वन गुर्जरों का परिवार। ब्यूरो
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सहारनपुर। दोपहर के करीब 2:30 बजे थे। पहाड़ियों के बीच से गुजर रही सूखी पड़ी सहंस्रा नदी में सिर पर लकड़ी रखकर जातीं दो महिलाएं। जो नदी के ऊंचे-नीचे पत्थरों के बीच से गुजरते हुए अपनी झोपड़ी की तरफ कदम बढ़ा रही थीं। उन्हें बातचीत के लिए जब रोका गया तो उन्होंने कपड़े से चेहरा ढक लिया और कहा कि जाके रोटी बनाणी है, फेर अंधेरा हो जागा। यहां बिजली भी न है। इतना कहकर वह आगे बढ़ गईं।
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वहां से कुछ दूर पहाड़ों से पानी रिसकर नदी में एक छोटी सी जलधारा के रूप में आ रहा है। एक महिला उस पानी को कपड़े से छानकर दूसरे बर्तन में इकट्ठा कर रही थी। क्योंकि पानी में छोटी-छोटी मछलियां थीं, उन्हें एक तरफ कर पीने के लिए पानी इकट्ठा किया जा रहा था। यह कोई फिल्मी सीन नहीं था, बल्कि शाकंभरी चौकी क्षेत्र में पहाड़ियों की तलहटी में नदी के किनारे बसे वन गुर्जरों की दिनचर्या का हिस्सा था, जो समाज की मुख्यधारा और विकास से कोसों दूर है। इनके पास न बिजली, न पीने के लिए हैंडपंप का पानी, न आमदनी का ठोस जरिया। व्यवस्था को आइना दिखाते हुए वन गुर्जरों की कई पीढि़यां गुजर गईं।

पीना पड़ता है पहाड़ों से रिसने वाला पानी
थोड़ा आगे घास-फूस की छान के नीचे 65 वर्षीय वन गुर्जर शफरू बैठे मिले। शफरू के परिवार में पत्नी, पांच बेटा-बेटी, दो बहू। कुल मिलाकर नौ सदस्य हैं, लेकिन रहने के लिए करीब 15 बाई 15 की एक घास-फूंस की झोपड़ी। ब्याह के बाद बेटी अपने ससुराल जा चुकी है। बाकी आठ सदस्य इसी झोपड़ी में गुजर-बसर कर रहे हैं। उसी में रसोई भी चलती है। बकौल शफरू, दादा-परदादा बताते थे कि हम जम्मू के रहने वाले हैं, लेकिन अब तो न जाने कितनी पीढि़यां यहां बीत गईं। पहाड़ों से रिसने वाला पानी पीते हैं।
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आयशा के परिवार में उसके चार बच्चे हैं, जिसमें सबसे छोटा दो साल का है। बकौल आयशा, उसका पति गुलाम पहले साथ रहता था, लेकिन यहां आमदनी का कोई साधन नहीं है, जब बच्चों के भूखे मरने की नौबत आई तब वह बाहर मजदूरी करने गया। कई बार भूखा भी रहना पड़ा। दुकान से कुछ सामान लेना हो तो नदी से होते हुए चार किमी दूर जाना पड़ता है।

रात में जंगली जानवरों का डर, जलाते हैं आग
55 वर्षीय शकीना कहती हैं कि जिंदगी बस जैसे-तैसे कट रही है। बिजली, पानी और आमदनी शुरू कराने के आश्वासन तो मिलते हैं, लेकिन सुविधा कभी नहीं मिली। दो वक्त की रोटी की जद्दोजहद में न दिन में आराम है और न रात की नींद। रात में जंगली जानवरों का डर लगा रहता है। उनकी वजह से रात भर झोपड़ी के बाहर आग जलाकर रखनी पड़ती है। जिससे जंगली जानवर न आएं। यह जिंदगी कुछ चुनिंदा परिवारों की नहीं, बल्कि वन गुर्जर के हर परिवार की यही कहानी है, जो न जाने कितने दशकों से सरकारी मदद की आस में टकटकी लगाए बैठे हैं। इन परिवारों का दर्द शब्दों में बयां करना मुश्किल है।
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