सहारनपुर, लखनौती। गेट आफ यूपी कहा जाने वाला गांव लखनौती इतिहास का साक्षी है। यहां मुगलकालीन भूल भुलैया, मंदिर और मस्जिद, इमामबारगाह, ईदगाह और शाही कब्रिस्तान आदि ऐतिहासिक धरोहर मौजूद हैं। हालांकि संरक्षण के अभाव में ये इमारतें अपने अस्तित्व के लिए जूझ रही हैं।
लखनौती हरियाणा की सीमा से सटी यूपी की अंतिम न्याय पंचायत है। इसमें 15 गांव शामिल हैं। तीस हजार की आबादी वाला यह गांव पहले पड़ोसी राज्य में था। यमुना नदी गंगोह और गांव लखनौती के बीच से होकर बहती थी। बाद में इसने अपना रुख बदल लिया। इसका उल्लेख एक अंग्रेज लेखक द्वारा किया गया है। यहां कई पुरानी मस्जिदें थीं। जिनका अस्तित्व समाप्त हो चुका है। मस्जिदें और ईदगाह अब राजस्व अभिलेखों में इतिहास बनकर रह गईं हैं।
इनके अलावा यहां मुगलकालीन किला भी मौजूद है। बसपा सरकार के वक्त में इन प्राचीन इमारतों को ग्रामीण पर्यटन स्थल के रूप में शामिल किया गया था। उस वक्त अधिकारियों ने इमारतों का निरीक्षण भी किया था लेकिन बाद में इसे फिर बिसरा दिया गया।
- आकर्षण का केंद्र है भूलभुलैया
ग्रामीण मुस्तफा खान बताते हैं कि गांव में बनी भूलभुलैया आज भी आकर्षण का केंद्र है। हालांकि इसकी कई सीढि़यां धराशायी हो चुकी हैं। इसमें इस तरह से जीने बनाए गए थे कि जिस जीने से आदमी ऊपर चढ़ता था उससे वापस नहीं उतर पाता था। नीचे उतरने के लिए उसे दूसरा जीना ही इस्तेमाल करना पड़ता था। हालांकि अब यह जीने क्षतिग्रस्त होने के चलते इसकी यह खूबी भी खत्म हो गई है। अब भी बड़ी संख्या में लोग इसे देखने आते हैं।
- यहां व्यापार केंद्र और सराफा बाजार था
ग्रामीण रूपचंद बताते हैं कि लखनौती मुगलकाल में व्यापार का बड़ा केंद्र था। यहां एक बड़ा सराफा बाजार भी था। सुरक्षा के लिए गांव में बादशाह के सैनिक तैनात रहते थे। बाद में अंग्रेजी शासन में भी यहां पुलिस चौकी रही। गांव में आज भी एक मस्जिद को पुलिस वाली मस्जिद कहते हैं।
- मुगलकाल में बड़ी आबादी करती थी निवास
पूर्व प्रधान के पति मिर्जा फरजंद अली ने बताया कि मुगलकाल में यहां बड़ी आबादी निवास करती थी। गांव का रकबा 52 हजार बीघा का था। उस वक्त हुए कई युद्धों से प्रभावित होकर अपने व्यापार और जीवन की रक्षा के लिए बड़ी संख्या में ग्रामीण यहां से पलायन करके अन्यत्र बस गए थे।
- ग्राम प्रधान अनीसा चौधरी के जेठ अब्बास अली का कहना है कि प्राचीन इमारतों को संरक्षण देने के लिए पुरातत्व विभाग या जिला प्रशासन की किसी योजना में कोई बजट जारी नहीं किया जाता। ग्रामीण इस धरोहर को बचाने के लिए अपने स्तर पर जद्दोजहद कर रहे हैं। लेकिन संसाधनों के अभाव में यह संभव नहीं हो पा रहा है। यदि सरकारी उपेक्षा का यही आलम रहा तो इन इमारतों का नामोनिशान मिट जाएगा।