- जड़ौदा पांडा में जूड़ मंदिर, शेरपुर में है परमहंस निजानंद आश्रम
- निजानंद आश्रम से कांग्रेस को मिली थी हाथ का पंजा चुनाव चिन्ह बनाने की प्रेरणा
अशोक कुमार
बड़गांव। महाभारतकालीन गांव जडौदा पांडा इतिहास की स्मृतियां संजोए है। जूड़ से जड़ौदा और पांड़वों के पड़ाव के चलते गांव का नाम जड़ौदा पांडा पड़ा था। बताते हैं कि महाभारत युद्ध से पहले पांचों पांड़व गांव के पूर्वी छोर पर स्थित तालाब किनारे पीपल के पेड़ के नीचे आकर रुके थे। इस तालाब को पांडव तालाब के नाम से जाना जाता है।
गांव के बुजुर्ग कांता प्रसाद त्यागी, कुंदन त्यागी, जनेश्वर प्रसाद, अरविंद त्यागी आदि बताते है कि हजारों वर्ष पहले घने जंगलों के बीच स्थापित जूड़ मंदिर में भगवान शिव का भव्य मंदिर है। यह मंदिर गांव के ही बाबा नारायण दास महाराज की कर्म स्थली रहा है। आसपास के ग्रामीणों द्वारा जूड़ मंदिर में आषाढ माह में शुक्ल पक्ष तिथि के दोनों रविवार को विशाल भंड़ारे का आयोजन किया जाता है। मंदिर में दूर दराज से हजारों की संख्या में श्रद्धालु पूजा करने पहुंचते हैं। बुजुर्ग बताते हैं कि महाभारत काल में जब पांड़व यहां आकर रुके थे, तो जड़ौदा पहले के देवभूमि होने के कारण वे ज्यादा दिन तक नहीं ठहर सके। कुछ समय बाद कुरुक्षेत्र की तरफ कूच कर गए जहां उनका कौरवों के साथ संग्राम हुआ था।
जड़ौदा पांडा के मजरे शेरपुर में प्रणामी संप्रदाय का सैकड़ों वर्ष पुराना भव्य मंदिर है जिसकी परमहंस निजानंद आश्रम के नाम से विदेशों तक में ख्याति है। इसके वार्षिकोत्सव में देश के विभिन्न राज्यों और दूसरे देशों से श्रद्धालु आते हैं।
बुजुर्ग ग्रामीण बताते हैं पहले कांग्रेस पार्टी का चुनाव चिन्ह गाय बछड़ा हुआ करता था। उसी दौरान पार्टी की बड़ी पराजय हुई तो परमहंस राम रतन दास के शिष्य तत्कालीन कांग्रेस नेता एचकेएल भगत सिंह शेरपुर आश्रम पहुंचे और कांग्रेस की जीत का आशीर्वाद मांगा। यहीं से उन्हे कांग्रेस के लिए हाथ का पंजा चुनाव चिन्ह करने की प्रेरणा मिली।
गांव जड़ौदा पांडा ब्लाक नानौता का सबसे बड़ा गांव है। यहां प्राथमिक स्कूल, पब्लिक स्कूलों से लेकर इंटर कॉलेज तथा ड़िग्री कालेज, बैंक शाखा, सहकारी समिति, पेट्रोल पंप, डाक घर, रिपोर्टिंग पुलिस चौकी, बिजली घर, सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र, पशु चिकित्सालय, दूरभाष केन्द्र आदि सुविधाएं हैं। गांव की साक्षरता दर करीब 90 प्रतिशत के आसपास है। जड़ौदा पांडा के चार मजरे किशनपुरा, जयपुर, शेरपुर, घिसरपड़ी सहित इसकी आबादी पच्चीस हजार के आसपास है लेकिन इसे अभी तक नगर पंचायत का दर्जा नहीं मिल पाया है। संवाद
अंग्रेजी शासन से ही रही शिकार खेलने पर रोक
ब्रिटिश शासन काल में गांव के बाहर नहर किनारे सिंचाई विभाग का एक आलीशान बंगला बना था, जो अब खंडहर में तब्दील हो चुका है। उस समय अंग्रेजी शासकों ने जंगली जानवरों का शिकार खेलना शुरू किया तो बाबा नारायण दास ने उनके खिलाफ मोर्चा खोलते हुए शिकार खेलने पर पाबंदी लगवाई थी। तभी से जड़ौदा पांडा क्षेत्र में शिकार खेलने पर पाबंदी लगी है। मान्यता है कि अगर किसी ने भूलवश भी इस क्षेत्र में शिकार किया, तो उसे बड़ा खामियाजा भुगतना पड़ता है।
श्री निजानन्द आश्रम शेरपुर