सहारनपुर। पंचामृत पद्घति से गन्ने की खेती करने वाले अन्य किसानों के लिए प्रेरणास्रोत बनेंगे। जनपद में 760 हेक्टेयर क्षेत्रफल में इस विधि से शरदकालीन गन्ना बुवाई कराई गई है। इस पद्धति में गन्ने की खेती की पांच विधियों को शामिल किया है। इससे गन्ना उत्पादन बढ़ाने के साथ ही भूमि की उर्वरा शक्ति भी कायम रखी जा सकेगी। गन्ना विभाग किसानों से पंचामृत पद्धति से गन्ना खेती करने पर जोर दे रहा है। इस विधि से खेती करने पर न सिर्फ गन्ने की उत्पादकता बढ़ेगी बल्कि लागत में भी कमी आएगी। इस खेती में समन्वित तरीके को अपनाया जाएगा। जिससे भूमि की उर्वरा शक्ति भी बरकरार रहेगी। शरदकालीन गन्ने की बुवाई ट्रेंच विधि से कर सहफसली की गई है। सहफसली में गेहूं, दलहन, तिलहन, आलू और सब्जियों की खेती शामिल है। इससे किसानों को अतिरिक्त आय भी प्राप्त होगी।
यह है पंचामृत पद्धति
गन्ने की पंचामृत पद्धति में ट्रेंच विधि से गन्ने की बुवाई कराई जाती है। इसमें दो लाइनों के बीच की दूरी तीन से पांच फुट रखी जाती है। दो लाइन के बीच में सहफसली के तौर पर गेहूं, तिलहनी और सब्जियों की खेती कराई गई है। इसमें पौधा गन्ना कटने के बाद पेड़ी के लिए जड़ों की कटाई के बाद रैटून मैनेजमेंट किया जाएगा। गन्ने की पत्तियों को खेत में बिछाकर ट्रेश मल्चिंग की जाएगी, साथ ही सिंचाई की ड्रिप विधि का प्रयोग कराया जा रहा है।
जनपद में 10143 हेक्टेयर क्षेत्रफल में शरदकालीन गन्ना बुवाई हुई है। इसमें से करीब 760 हेक्टेयर में गन्ने की पंचामृत पद्धति अपनाई गई है। इस विधि से जहां गन्ने की खेती की लागत घटती है वहीं उत्पादकता में भी बढ़ोतरी होती है। ऐसे किसान अन्य के लिए प्रेरणस्रोत्र बनेंगे। - सुशील कुमार, जिला गन्ना अधिकारी