स्वतंत्रता सेनानी ठा बिशंभर सिंह
- फोटो : SAHARANPUR
सहारनपुर, बेहट। संपन्न परिवार का इकलौता बेटा होने पर भी सारी सुख सुविधाएं छोड़ कलसिया के ठा बिशंभर सिंह आजादी की जंग में कूद पड़े थे। वे कई बार जेल गए। अंग्रेजी सरकार ने दबाव बनाने को उनकी सारी जमीन कुर्क कर ली थी लेकिन फिर भी उनका हौंसला नहीं तोड़ सकी।
ठा बिशंभर सिंह महाशय का जन्म 10 जनवरी 1904 को संपन्न किसान चौधरी बिशन सिंह के यहां हुआ था। सादा जीवन उच्च विचारों के धनी ठा बिशंभर सिंह को जनता महाशय के नाम से पुकारती थी। इसीलिए उनके नाम के आगे महाशय पड़ गया। 29 साल की उम्र में वह आजादी की लड़ाई में कूद पड़े थे। पहली बार उन्हें 10 मार्च 1933 को पास के गांव दयालपुर में आयोजित सभा में अंग्रेजों भारत छोडों और भारत माता की जय के नारे लगाने पर उन्हे जेल में डाल दिया गया था। उन्होंने पांच साल की जेल काटी। इसके बाद व्यक्तिगत सत्याग्रह के दौरान उन्हें 2 जुलाई 1941 को एक वर्ष की सजा सुनाई गई और एक हजार रुपये का जुर्माने लगाया गया। इस दौरान उन्हें कठोर यातनाएं भी दी गई, लेकिन अंग्रेजों हुकूमत का जुल्म और ज्यादती भी उनका हौंसला नहीं तोड़ सकी। 9 अगस्त 1942 को वे अंग्रेजों भारत छोड़ो आंदोलन में कूद पड़े। उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया और 14 महीने की सजा सुनाई गई।
ठा बिशंभर सिंह के बेटे इंटर कालेज से सेवानिवृत प्रवक्ता संतोष कुमार चौहान बताते हैं कि अंग्रेजों ने उनकी जमीन भी कुर्क कर ली थी। बाबा बिशन सिंह अकेले रह गए थे। उनके सभी मवेशियों की भी मौत हो गई थी। परिवार पर गंभीर आर्थिक संकट आ खड़ा हुआ, लेकिन उनके पिताजी आजादी की लड़ाई में डटकर खड़े रहे। स्वतंत्रता की 25 वीं वर्षगांठ पर उन्हें यूपी के तत्कालीन मुख्यमंत्री कमलापति त्रिपाठी द्वारा ताम्र पत्र देकर सम्मानित किया गया था। वर्ष 1985 में 81 साल की उम्र में ठाकुर बिशंभर सिंह का निधन हुआ। उनके परिवार में उनके बेटे संतोष के अलावा दो पौत्र हैं।
ठाकुर बिशंभर सिंह को मिला ताम्र पत्र।- फोटो : SAHARANPUR