सहारनपुर में सियासत को लहू पीनेे की लत है, नहीं तो मुल्क में सब खैरियत है। मुनव्वर राणा का यह शेर सहारनपुर में उपजे बवाल पर बेहद सटीक बैठता है।
बसपा का गढ़ और दलित बहुल सहारनपुर में फैल रही आक्रोश की ज्वाला अत्याचार की सियासत से भड़क रही है। सियासतदां दलित वोट बैंक को अपने पाले में करने के लिए अब छोटी-छोटी घटनाओं को तूल देकर न्याय के प्रतिकार के मुद्दे को हवा दे रहे हैं।
इसी का नतीजा है कि दलितों के मन में यह बात घर करने लगी है कि प्रशासन और पुलिस तटस्थ या पक्षपातपूर्ण हैं। यही कारण है कि इतना जल्दी दलित समाज लामबंद होकर हाथों में तलवार और तमंचा लेकर सड़कों पर उतर आया।
इस पूरे घटना से एक बात साफ है कि अत्याचार की हवा बनाकर आक्रोश की ज्वाला भड़काई जा रही है। अगर इस हालात पर काबू नहीं किया गया तो सहारनपुर ही नहीं समूचे पश्चिमी यूपी दंगे से भी खराब हालात हो जाएंगे।
बसपा के सबसे मजबूत किले में हमेशा हाथी की चिंघाड़ता था। मगर, पहले लोकसभा और फिर विधानसभा चुनाव में भाजपा की लहर में इसके महावत खुद नीचे उतर गए हैं।
इसके बाद सड़क दूधली से लेकर शब्बीरपुर कांड में दलितों को निशाना बनाया गया तो समाज के लोगों में असुरक्षा की भावना आने लगी। सियासत का दौर भी यहीं से शुरू हुआ है।
दलितों को अपने पाले में करने के लिए सियासी लोग उन घटनाओं को तूल देने के साथ ही उन्हें अत्याचार तक का अहसास कराने में जुट गए। इतना ही नहीं, पुलिस प्रशासन की कार्रवाइयों से भी उनका विश्वास हटाने की पुरजोर कोशिशें की गई हैं।
यही कारण है कि लोकसभा और विधानसभा चुुनाव में खुद को हिंदुत्व के पाले में खड़ा करने वाला दलित एक झटके में अलग-थलग सा महसूस करने लगा।
सड़क दूधली में बिना अनुमति अंबेडकर जयंती की शोभायात्रा निकालने पर दलित-मुस्लिम संघर्ष हुआ। उस वक्त दलितों ने आक्रोश जरूर दिखाया, मगर, सड़कों पर नहीं उतरे।
हालांकि उस वक्त इस मुद्दे को भाजपा भुनाना चाहती थी। दूसरे दल इस मुद्दे पर तटस्थ ही रहे थे। शब्बीरपुर की घटना के बाद भाजपा भले ही बैकफुट पर रही, मगर दूसरे दल दलितों के समर्थन में उतरने से गुरेज नहीं किया। ऐसे में अब तक पनप रहे आक्रोश पर सियासी हवा से इनकार नहीं किया जा सकता।