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पुलिस के खिलाफ शिकायतों की जांच को लटका रहे अफसर

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पुलिस के खिलाफ शिकायतों की जांच को लटका रहे अफसर
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सहारनपुर। अलग-अलग तरह के अपराधों और उत्पीड़न के मामलों में पुलिस के खिलाफ की जाने वाली शिकायतों की जांच को अफसर लगातार लटकाते आ रहे हैं। खाकी को बचाने के चक्कर में अफसरों की ओर से पीड़ितों की अनदेखी की जा रही है। पिछले कुछ ही महीनों में पुलिस कर्मचारियों के खिलाफ उठाए गए मामलों में यही हालात सामने आए हैं। इन मामलों में कुछ पीड़ित कोर्ट का सहारा ले रहे हैं तो कुछ प्रकरण में पंचायतें तक आयोजित कराई जा रही हैं। सवाल यह है कि यदि पुलिस गलत नहीं है तो फिर जांच और कार्रवाई में देरी क्यों हो रही है।
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केस नंबर एक-
आरोपियों पर कार्रवाई का दंभ भरने वाली पुलिस सहारनपुर दंगे के आरोपी भीम आर्मी के राष्ट्रीय अध्यक्ष विनय रत्न के मामले में हुई फजीहत किसी से छिपी नहीं है। छुटमुलपुर में 12 हजार के इनामी विनय के घर पर कुर्की नोटिस चस्पा करने के दौरान फतेहपुर पुलिस ने सामने होते हुए रत्न को गिरफ्तार नहीं किया। पांच दिन बीत गए है, मगर अब तक जांच किसी नतीजे पर नहीं पहुंची है।
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केस नंबर दो-
रामपुर कोतवाली निरीक्षक द्वारा भाजपा नेता से अभद्रता का मामला गरमाया हुआ है। इस मामले में गुर्जर समाज पंचायत कर आक्रोश जता चुका है। कई दिन पहले अधिकारियों से मिलकर कार्रवाई की मांग की गई है। इस मामले में भी एसएसपी ने जांच के आदेश दिए है। मगर जांच अटकी है।
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केस नंबर तीन
19 जनवरी के हादसे में घायल छात्रों को उपचार न दिलाने के मामले में डायल 100 के तीन सिपाहियों के खिलाफ जांच का अब तक कोई परिणाम नहीं आया है। उस समय अधिकारियों ने आरोपी पुलिसकर्मियों की बर्खास्तगी तक करने का दावा किया था। तब से लेकर अब तक यह जांच पूूरी नहीं हो सकी है। आरोपी पुलिस कर्मियों के बयान न होने की बात कहकर मामले को ठंडे बस्ते में डाला गया है।
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केस नंबर चार
गंगोह पुलिस द्वारा फरवरी माह में बीएसएफ जवान अजय कुमार के परिवार के बुजुर्ग और महिलाओं को एफआईआर दर्ज कर जेल भेजने के मामले में भी पुलिस कार्रवाई पर सवाल उठे थे। वीडियो वायरल होने के साथ ग्रामीणों ने कई दिन तक हंगामा किया था। तब अधिकारियों ने जांच कराकर दोषी पुलिसकर्मियों के खिलाफ कार्रवाई का भरोसा दिया था। लेकिन इस मामले की जांच का कोई नतीजा अब तक सामने नहीं आया है।
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साक्ष्यों की उपलब्धता में दिक्कतों से होती है जांच में देरी

पुलिसकर्मियों के खिलाफ आने वाली हर शिकायत को भी गंभीरता से लेकर जांच कराई जाती है। इन मामलों की जांच अभी प्रचलित है। शिकायतकर्ताओं द्वारा आरोप के समर्थन में साक्ष्य उपलब्ध कराने में हीलाहवाली की वजह से जांच रिपोर्ट आने में देरी हो रही हैं। किसी भी नजरिए से आरोपियों को बचाने की कोई मंशा नहीं है।
प्रबल प्रताप सिंह, पुलिस अधीक्षक नगर।
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