दोनों पैर से दिव्यांग फिरोज कुमार प्राइवेट नौकरी करते हैं। फिरोज का कहना है कि दृष्टि बाधित होने के बावजूद शिव कुमार गुप्ता मानसिक रूप से पूरी तरह मजबूत हैं। वह सभी के दुख सुख में साथ खड़े रहने वाले व्यक्ति हैं, जो सभी दिव्यांगजनों के लिए प्रेरणा भी हैं।
29 साल की उम्र में चली गई आंखों की रोशनी
शिवकुमार मूल रूप से शामली के गांव रसूलपुर के रहने वाले हैं, जिनके पिता सहारनपुर में रोडवेज में कंडक्टर थे। वर्तमान में शिव कुमार कांशीराम कॉलोनी में रह रहे हैं। शिव कुमार गुप्ता बचपन से दृष्टिहीन नहीं हैं। तेरह साल की उम्र में 1968 में उन्हें चेचक और टाइफाइड ऐसा हुआ कि आंखों की रोशनी कम हो गई। 1984 में उनको दिखना पूरी तरह बंद हो गया। शिव कुमार की शादी हुई और उनके चार बच्चे हैं, जिनमें दो बेटे और दो बेटियां हैं।
दिव्यांगों को दया नहीं सहयोग की जरूरत
शिवकुमार गुप्ता का कहना है कि दिव्यांगों को समाज से दया नहीं चाहिए। यदि सरकार और समाज उनके लिए कुछ करना चाहता है तो उनको उनके पैरों पर खड़ा करने के लिए उनके रोजगार की व्यवस्था करे। उनको भी समाज में स्वाभिमान के साथ जीने का अधिकार है। क्योंकि दिव्यांग जब किसी की दया पर पलने लगता है तो वह और कमजोर हो जाता है। ऐसे में वह सभी दिव्यांगजनों को मेहनत करने के लिए प्रेरित करते हैं।