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मानव जीवन का उद्देश्य ईश्वरीय आनंद की प्राप्ति करना

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अंबेहटा (सहारनपुर)। कस्बे में आर्य समाज के तीन दिवसीय वार्षिकोत्सव का सोमवार को शुभारंभ हो गया। पहले दिन विद्वानों ने मानव उत्थान के लिए वेदों की शिक्षा को अपनाने की बात कही। कार्यक्रम का शुभारंभ यज्ञ से हुआ। यज्ञ के बह्मा आचार्य वीरेंद्र शास्त्री व यज्ञमान प्रेमचंद सैनी रहे। प्रवचन करते हुए सहारनपुर से पधारे आर्य समाज के प्रचारक आचार्य वीरेंद्र शास्त्री ने कहा कि मानव जीवन का उद्देश्य ईश्वर के आनंद की प्राप्ति करना है। परम पिता परमात्मा ने वेदों में दो प्रकार का ज्ञान दिया है। एक का नाम परा विद्या है तथा दूसरे का नाम अपरा विद्या है। बताया कि अपरा विद्या का अर्थ भौतिक ज्ञान है जबकि परा विद्या का अर्थ अध्यात्मिक ज्ञान है। संसार का जितना भी ज्ञान है पृथ्वी से लेकर परमाणु परयंत तक का यह सब अपरा विद्या कहलाता है। बताया कि आत्मा परमात्मा का बोध परा विद्या कहलाता है। बिना परा विद्या के अर्थात आत्मा व परमात्मा के बोध के बिना जीवात्मा की मुक्ति नही हो सकती। ईश्वर के नामों की चर्चा करते हुए आचार्य वीरेंद्र शास्त्री ने बताया कि ईश्वर के गौणिक नाम असंख्य है, परंतु परमात्मा का निज व मुख्य नाम ओम है। उन्होंने बताया कि महर्षि दयानंद सरस्वती ने अमर ग्रंथ सत्यार्थ प्रकाश में ईश्वर के नामों की व्याख्या कर भ्रम को दूर करने का काम किया है। बिजनौर व दिल्ली से पधारे भजनोपदेशक योगेश दत्त आर्य व दिनेश दत्त आर्य ने भजनों के माध्यम से विचार रखते हुए सामाजिक कुरीतियों पर प्रहार किया। संचालन निशांत मित्तल ने किया। वीरेंद्र मित्तल, अश्वनी आर्य, प्रेमचंद सैनी, डा. संजय मित्तल, सुखबीर धीमान, श्रीराम शर्मा, सुबोध सिंघल, मनोज आर्य, मूर्ति देवी, निर्मल आर्य, रतन पांचाल, रकम सिंह आर्य सहित अन्य लोग उपस्थित रहे।
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