उत्तर प्रदेश के इतिहास में रामपुर को नवाबों के शहर के तौर पर जाना जाता है, लेकिन उत्तर प्रदेश की राजनीति में रामपुर की पहचान समाजवादी पार्टी के कद्दावर नेता आजम खान से है। आजम खान इन दिनों कई आरोपों के चलते जेल में बंद हैं, लेकिन सपा ने उन्हीं पर दांव चला है। जेल में बंद होने के बाद भी रामपुर में आजम खान की बादशाहत कायम है।
खल रही आजम खान की कमी
करीब 20 साल से आजम खान की चुनाव व्यवस्था देख रहे आसिम राजा ने अमर उजाला को बताया कि आजम खान को राजनीति में करीब 45 साल हो चुके हैं। उन्होंने पहला चुनाव 1977 में लड़ा था। उसके बाद से वह लगातार रामपुर की जनता के बीच सक्रिय हैं। जब वह सरकार में अहम पदों पर थे, तब तक उन्होंने रामपुर के विकास के लिए कई अहम कार्य किए। इस वक्त वह कई आरोपों के चलते जेल में हैं, जिससे रामपुर को उनकी कमी खल रही है। असीम राजा कहते हैं कि इस चुनाव में कार्यकर्ताओं के साथ-साथ आम लोग भी आजम खान अनुपस्थिति को महसूस कर रहे हैं।
पत्नी और बेटे ने संभाला मोर्चा
जेल में होने के कारण आजम खुद प्रचार नहीं कर पा रहे हैं। ऐसे में उनकी कमी पत्नी तजीन फातिमा और बेटे अब्दुल्ला आजम पूरी कर रहे हैं। तजीन फातिमा महिलाओं को साधने की कोशिशों में जुटी हुई हैं, जबकि अब्दुल्ला ने डोर टु डोर कैंपेन की जिम्मेदारी संभाल रखी है। अब्दुल्ला सुबह 10 बजे रामपुर स्थित अपने घर पर कार्यकर्ताओं और लोगों से मुलाकात करते हैं। इसके बाद रामपुर से करीब 29 किलोमीटर दूर स्वार विधानसभा सीट पर जनसंपर्क के लिए जाते हैं। रात 9 बजे घर लौटकर वह रामपुर सीट पर अपने पिता आजम खान के लिए कैंपेनिंग करते हैं और देर रात तक कार्यकर्ताओं के साथ बैठक करते हैं।
आजम खान के समर्थकों ने लगाया आरोप
गौरतलब है कि कोविड संक्रमण को देखते हुए चुनाव आयोग ने कई प्रतिबंध लगा रखे हैं। इसके चलते आजम खान के लिए प्रचार कर रहे कार्यकर्ताओं का आरोप है कि यह प्रतिबंध चुनाव के शुरुआती दो चरणों में लगाया गया, जो कि जानबूझकर किया गया। हालांकि, हमने भी आजम खान की बात लोगों तक पहुंचाने का तरीका निकाल लिया है। आज भले ही आजम खान जेल में हैं, लेकिन वह रामपुर के हर शख्स के घर में मौजूद हैं। उनके बेटे अब्दुल्ला आजम खान की जितनी भी रैलियां हो रही हैं, उन्हें सोशल मीडिया प्लेटफार्म के जरिए लोगों तक पहुंचाया जा रहा है। इसके अलावा व्हाट्सएप सहित अन्य सोशल मीडिया एप की भी मदद ली जा रही है।