रायबरेली। आज हम एक बार फिर कारगिल विजय दिवस मनाने जा रहे हैं। इस लंबे अंतराल के बाद आज भी जिले में शहीद राजेंद्र यादव की यादें छिपी हुई हैं। कारगिल विजय दिवस की जब-जब बात होती है तो सबसे पहले उनका नाम आता है। मातृभूमि के प्रति उनके जज्बे को देखकर हर कोई सलाम करता है। दुुश्मनों को अपनी वीरता और साहस से उन्होंने चारों खाने चित्त कर दिया था। जान गंवा दी थी, लेकिन उन्होंने तिरंगे को झुकने नहीं दिया था।
डलमऊ तहसील के एक छोटे से गांव मुतवल्लीपुर में जन्मे राजेंद्र यादव ने थल सेना के कुमाऊं रेजीमेंट से सिपाही के पद पर शुरुआत की थी। 1984 में सेना में अपनी काबिलियत और वीरता के दम पर ही जल्दी ही नायक बना दिए गये थे। पाकिस्तानी सैनिकों के कारगिल पर घुसपैठ के बाद राजेंद्र यादव ने मोर्चा लिया। राजेंद्र ने कारगिल की तुर्तुब सीमा की चौथी पहाड़ी पर दुश्मनों से लोहा लिया था। उनकी वीरता और साहस से दुश्मनों के दांत खट्टे हो गए थे। युद्ध लड़ते-लड़ते राजेंद्र यादव सदा के लिए भारत माता की गोद में सो गए। आज जिले के लोग शहीद राजेंद्र यादव की वीरता की मिसाल देते नहीं थकते। उनके जोश और जज्बे से प्रेरित होकर जिले के युवा सेना की ओर रुख कर रहे हैं।
शहीद के परिवार को वादे पूरे न होने की कसक
डलमऊ। गांव पहुंचते ही शहीद राजेंद्र यादव की यादें ताजा हो जाती हैं। आज भी यहां लोग उनकी यादों को समेटे हुए हैं। ग्रामीण कहते हैं कि राजेंद्र बचपन से ही बहादुर थे। वह आज हमारे बीच में नहीं हैं, लेकिन उनकी वजह से उनका गांव आज याद किया जाता है। गांव की गलियां आज भी जैसे शहीद का इंतजार कर रही हैं। बड़े भाई रमेश यादव ही घर पर रहते हैं। वह बताते हैं कि उनके पिता रामदुलारे, मां सुंदारा का निधन हो चुका है। शहीद राजेंद्र यादव दूसरे नंबर के थे। उनके तीसरे भाई जगदीश यादव का निधन हो गया है, जबकि चौथे भाई रामदेव शहर में रहते हैं।
शहीद की पत्नी और बच्चे शहर के परियावां कोठी में रहते हैं। शहीद राजेंद्र यादव अपने पीछे पत्नी ललिता यादव, दो बेटे रजत यादव, अतुल यादव और बेटी अनीता यादव को छोड़ गए हैं। अतुल और बेटी की शादी हो चुकी है, जबकि बेटा रजत यादव पढ़ाई कर रहा है। अतुल यादव मर्चेंट नेवी में काम करता है। बड़े भाई कहते हैं कि राजेंद्र की शहादत के बाद भी वादे पूरे न किए जाने की कसक उन्हें और उनके परिवार को आज भी है। पांच बीघे जमीन देने की बात कही गई थी। जमीन अभी तक नहीं मिल पाई। इसकी टीस हमेशा रहती है। गांव में शहीद राजेंद्र यादव के नाम का पार्क नहीं बनाया गया है।