कालाकांकर राजशाही ठाट के साहित्य के लिए भी महत्वपूर्ण रहा है। इसका अहसास सुमित्रानंदन पंत के निवास ‘नक्षत्र’ से होता है। उनके निवास के 10 वर्षों को साहित्य का स्वर्णिम समय माना गया है। कई प्रसिद्ध रचनाओं के साथ ही एक पत्र का भी संपादन यहां से हुआ है। इन्हीं यादों को जीवित रखने को हर वर्ष ‘गुंजन’ समिति कार्यक्रम का आयोजन करती है।
कालाकांकर के नरेश राजा अवधेश सिंह के छोटे भाई कुंवर सुरेश सिंह साहित्य प्रेमी थे। लखनऊ में अल्मोड़ा जाने के दौरान ट्रेन में उनकी मुलाकात सुमित्रानंदन पंत से हो गई थी। कुछ घंटों के सफर में उनकी पल्लव नामक रचना उन्होंने सुनी और इतने प्रभावित हुए कि उन्हें कालाकांकर आने का निमंत्रण दे दिया।
पंत जी ने उनके निमंत्रण को स्वीकार किया और कुछ दिनों के लिए कालांकांकर आए। यहां के सुरम्य वातावरण से वह इतने प्रभावित हुए कि रुकने का मन बना लिया। इसके बाद वह यहां करीब 10 वर्ष रहे। कुंवर सुरेश सिंह ने उनके लिए नक्षत्र निवास का निर्माण करा दिया। इसके बाद जो साहित्य की गंगा कालाकांकर से बही तो फिर रुकी नहीं। उन्होंने ग्राम्या, युगवाणी, गुंजन, ज्योतिसमा, युगान्त, नौका विहार सहित कई रचनाएं की। यही नहीं उन्होंने ‘रूपाभ’ नामक पत्र का संपादन भी यहां रहकर किया। उनके रहने के समय यहां सहित्यकारों का भी जमवाड़ा रहता था। महादेवी वर्मा, मैथिलीशरण गुप्त, सोहनलाल द्विवेदी, रामचंद्र टंडन, नारेंद्र शर्मा, सियाराम शरण गुप्त, पं.मदनमोहन मालवीय जी भी उनसे मिलने यहां आते थे। बताते हैं कि उत्तराखंड अल्मोड़ा स्थित सुमित्रानंदन पंत साहित्यिक वीथिका में उनके व कुंवर सुरेश के बीच होने वाले पत्र भी रखे हैं।
सुमित्रानंदन पंत के कालाकांकर में रहने के दौरान तीन लोगों की खूब जमती थी। कुंवर सुरेश सिंह के साथ ही उनकी राजेंद्र बहादुर सिंह लल्लू साहब से भी खासी छनती थी। पंत जी लिखते थे और राजेंद्र बहादुर सिंह लल्लू साहब संगीतकार होने के कारण उसे स्वरबद्ध कर संगीत देते थे। कई बार ऐसा हुआ जब लल्लू साहब गाते तो दोनों ही प्रफुल्लित हो जाते। इन तीनों की तिकड़ी मरने के बाद भी नहीं टूटी। तीनों एक साथ तो कालकवलित नहीं हुए लेकिन पुण्यतिथि एक ही दिन 28 दिसंबर को पड़ती है। इस पुण्यतिथि को मनाने के लिए लल्लू साहब के पुत्र कुंवर भुवनेंद्र सिंह ने ‘गुंजन’ नामक एक समिति का गठन किया। यह समिति पुण्यतिथि के साथ समय-समय पर उनके संस्मरणों को जीवित रखती है।