सफलता के ट्रैक पर ऐसा फर्राटा कि बदल दिए हालात
. शहर के दहिलामऊ की रहने वाली खूशबू ने मार्च 2019 में चीन में आयोजित विश्व पुलिस और फायर गेम्स प्रतियोगिता में दो स्वर्ण और रजत पदक जीतकर देश को गौरान्वित किया है। खूशबू ने पांच किमी क्रॉस कंट्री दौड़ व तीन किमी स्पीपल चेज में स्वर्ण व 1500 मीटर दौड़ व रिले रेस में रजत पदक प्राप्त किया है। चीन में पदक जीतने वाली वह उत्तर प्रदेश की पहली खिलाड़ी हैं। वर्तमान में वह असम में सशस्त्र सीमा बल में सेवा दे रही है। उनके पिता रामआसरे गुप्ता मोची का काम करते थे। इतनी आमदनी कभी नहीं रही कि बेटी को प्रोफेशनल कोच के पास भेजकर प्रशिक्षित करा सकें। बेटी ने अपनी लगन से दुनिया जीत ली। खूशब बेबाकी से कहती हैं कि घर की परिस्थिति सफलता में बाधक नहीं बन सकती है। केवल दृढ़ इच्छाशक्ति के साथ कार्य करने की जरूरत होती है। बेटी के सफल होने के बाद अब पिता ने फुटवियर की दुकान खोल ली है।
दूध-बादाम नहीं मिला तो हौसलों से जीता अखाड़ा
कंधई थाना क्षेत्र के आसलपुर निवासी वर्षा राजे महाराष्ट्र के पुणे में सीआरपीएफ में हेड कांस्टेबल हैं। उनके पिता खेती करते हैं। कुश्ती के लिए हमेशा दूध और बादाम की जगह हौसले पर फोकस रखा। पिता की मेहनत से कमाई हुई रोटी खाकर इतनी ताकत झोंकी कि मैदान में जीवन के सारे संघर्ष मात खा गए। सीआरपीएफ में उनका चयन खिलाड़ी कोटे से हुआ। मार्च 2020 में हिमाचल प्रदेश में आयोजित राष्ट्रीय कुश्ती प्रतियोगिता में कांस्य पदक प्राप्त किया। वर्ष 2022 में रांची में आयोजित राष्ट्रीय कुश्ती प्रतियोगिता में सीनियर वर्ग में रजत पदक प्राप्त किया। खेल के साथ पैरामिलिट्री फोर्स को कैरियर के रूप में चुना।
बच्चों को विज्ञानी बनाने को प्रयासरत रश्मि
. पट्टी तहसील क्षेत्र के दीवानगंज की रहने वाली रश्मि मिश्रा उच्च प्राथमिक विद्यालय मरूआत में विज्ञान की शिक्षिका है। रश्मि के प्रयास से विद्यालय के दो विद्यार्थी अंतरराष्ट्रीय स्तर, चार विद्यार्थी राष्ट्रीय व दस विद्यार्थी विज्ञान मॉडल के लिए राज्य स्तर पर पुरस्कृत हो चुके हैं। उनकी सफलता की कहानी टाटा बुक प्रेस में प्रकाशित हो चुकी है। 2021 में राज्य अध्यापक पुरस्कार और 2022 में बेसिक शिक्षा मंत्री संदीप ने उन्हें पुरस्कृत किया है। उन्होंने कहा कि बच्चों को विज्ञान के क्षेत्र में ऊंचे मुकाम पर पहुंचाने का लक्ष्य है। लगातार प्रयास करने से किसी भी क्षेत्र में सफलता अर्जित की जा सकती है। वह बेहद साधारण परिवार से हैं।
आत्मनिर्भरता की राह दिखा रहीं खुशबू
शहर के विक्रम चौराहे की रहने वाली रंजना सिंह के सीने से लेकर पैर तक शरीर काम नहीं करता है। इसके बावजूद रंजना ने तन की कमी को मन पर हावी नहीं होने दिया। दस साल की उम्र में दिव्यांग होने जाने के बावजूद पढ़ाई जारी रखकर एलएलबी की डिग्री हासिल की। महिलाओं को स्वरोजगार से जोड़ने के लिए वह सिलाई, कढ़ाई, पेंटिंग, मेहंदी, ब्यूटीशियन का प्रशिक्षण दे रही हैं। उन्होंने बताया कि महिला समाज का प्रमुख हिस्सा होती है। इसलिए उनका रोजगार से जुड़ना जरूरी है। अपने कौशल से उनको स्वरोजगार के लिए तैयार कर रही हूं। करीब 60 से अधिक महिलाएं प्रशिक्षण लेकर रोजगार भी कर रही हैं।