पवित्र धाम अयोध्या में प्रभु श्रीराम मंदिर निर्माण के लिए शुरू हुए आंदोलन में कारसेवकों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। जिस तरह कारसेवकों ने प्रभु श्रीराम मंदिर निर्माण के लिए अपना तन, मन, धन सब समर्पित कर दिया। ठीक उसी तरह कारसेवकों की सेवा करने में प्रतापगढ़ के ग्रामीण भी पीछे नहीं हटे।
उन्होंने भी कारसेवकों को प्रभु श्रीराम का स्वरूप मान कर उनकी चरण वंदना करते हुए सेवा की। गांव-गांव उनके चरण धोने के साथ उनके भोजन और विश्राम की व्यवस्था भी की गई।
प्रभु श्रीराम मंदिर निर्माण आंदोलन में शमिल होने के लिए कारसेवकों का जत्था प्रतापगढ़ से होकर अयोध्या पहुंचता था। महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश तथा अन्य राज्यों से पैदल निकले कारसेवक प्रयागराज होते हुए अवध क्षेत्र प्रतापगढ़ में दाखिल होते थे। फिर अयोध्या के लिए जाते थे।
प्रशासन की डर की वजह से कारसेवक गांव-गांव होते हुए अयोध्या धाम पहुंचे। उन्होंने मुख्य मार्ग का सहारा नहीं लिया। सई नदी की जलधारा को पारकर वे गांवों में पहुंचे। उनमें डर था कि कहीं प्रशासन उन्हें पकड़कर जेल में न बंद कर दे। हालांकि उन्हें जेल जाने से भय नहीं था। उनका लक्ष्य कुछ और ही था, जिस कार्य के लिए वह निकले थे।
इसके बावजूद कई कारसेवक प्रशासन को चकमा नहीं दे सके। पकड़े जाने पर उन्हें चिलबिला स्थित पॉलिटेक्निक कॉलेज में बने अस्थायी जेल में बंद कर दिया गया था। प्रतापगढ़ के बॉर्डर देल्हूपुर क्षेत्र से ही कारसेवकों के लिए गांव-गांव भोजन की व्यवस्था थी।
गांवों में चल रहे लंगर में भोजन करने के बाद वह रात हो जाने पर दूसरे गांव में रूक जाते थे। जिस गांव में कारसेवकों का जत्था रुकता था। वहां पर उनके विश्राम, भोजन के सभी व्यवस्था रहती थी।
कभी-कभी पुलिस के अचानक पहुंचने पर समस्या हो जाती थी। इसके बाद कारसेवकों को खेत में ले जाकर चोरी-झिपे भोजन कराकर अयोध्या जाने का सुरक्षित रास्ता बताकर भेजा जाता था।
बाबा बेलखरनाथ ब्लाक क्षेत्र के ओझला गांव में स्थित द्वारिका भवन जहां कार सेवकों के लिए चलता था
बाबा बेलखरनाथ ब्लाक क्षेत्र के ओझला गांव में स्थित द्वारिका भवन जहां कार सेवकों के लिए चलता था