शहर के स्कूलों में अपने लाडले को पढ़ाने के लिए अभिभावक हर कीमत चुकाते हैं और स्कूलों की शर्तों को भी पूरा करते हैं। इसके बावजूद उनके लाडलों पर स्कूल आने व जाने के दौरान खतरा मंडराता रहता है। स्कूली बसों में बच्चों को भूसे की तरह ठूंसा जा रहा है। मानक की अनदेखी करके चलने वाले डग्गामार वाहन बेल्हा में भी एटा जैसी घटना को दावत दे रहे हैं। एआरटीओ के मानक पर खरी नहीं उतरने वाली अधिकांश बसों का न तो बीमा होता और न ही रजिस्ट्रेशन। जबकि स्कूल संचालक वाहन के नाम पर अभिभावकों से पांच सौ से आठ सौ रुपये तक वसूली करते हैं।
गुरुवार की सुबह एटा जिले में ट्रक और स्कूली बस में हुए भिडंत में दो दर्जन से अधिक बच्चों की दर्दनाक मौत होने और 30 से अधिक के घायल होने से जिले के अभिभावक तो सहम गए, मगर निजी कॉलेज संचालकों पर कोई असर नहीं पड़ा। जांच में इस बात का खुलासा हुआ कि जो बस बच्चों को लेकर आ रही थी, उसका रजिस्ट्रेशन ही नहीं हुआ था। गुरुवार को शहर के अधिकांश कॉन्वेंट स्कूलों की बसों में बच्चों को ठूस-ठूसकर भरा गया था।
प्रतिदिन हाईवे से गुजरने वाली बसों पर बैठने के लिए चालीस बच्चों की सीटें होती है, मगर इन बसों में ठूस-ठूसकर 80 बच्चे बिठाए गए थे। गुरुवार को स्कूल की कई बसों में क्षमता से अधिक बच्चों को बैठाया गया था। गुरुवार को जब कैमरा चमका तो चालक बस तेजी से लेकर शहर की ओर भाग निकला।
अधिकतर बसों का नहीं है रजिस्ट्रेशन
कान्वेंट स्कूलों चलने वाली अधिकांश बसें ऐसी हैं जिनका एआरटीओ कार्यालय में रजिस्ट्रेशन तो है लेकिन फिटनेस नहीं है। किसी का इंश्योरेंस तक नहीं है। कुछ स्कूल संचालक ऐसे भी हैं, जो नई बसों में पुरानी बस का नंबर डालकर चला रहे हैं। यह स्कूल संचालक अभिभावकों से 500-800 रुपये प्रतिमाह वाहन शुल्क वसूलते हैं, मगर बच्चों को सुविधा के नाम पर कुछ भी देने को तैयार नहीं है।