बीसलपुर का छोटा सा गांव है खांडेपुर, लेकिन 23 स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों की जन्म स्थली होने का गौरव इस गांव को प्राप्त है। या फिर ये कहें कि इस गांव को ही आजादी के समय स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों ने अपनी कार्यस्थली बना रखा था तो गलत न होगा। इस गांव के स्वतंत्रता संग्राम सेनानी महाशय रामस्वरूप ही सभी स्वतंत्रता सेनानियों का नेतृत्व करते थे। इस गांव में देश की आजादी के आंदोलन की जो भी रणनीति बनाई जाती थी, मंडल के सभी जिलों में उस पर अमल होता था। वर्ष 1942 में यहां एक कांफ्रेंस बुलाई गई थी, जिसमें महात्मा गांधी, सुभाष चंद्र बोस, जवाहरलाल नेहरू और विजय लक्ष्मी पांडेय ने भी भागीदारी की थी। कांफ्रेस की भनक लगने पर अंग्रेजी सैनिकों ने हमला बोल दिया था। अंग्रेजी सैनिक गांव के कई युवकों को पकड़ कर ले भी गए थे। अंग्रेजी सैनिकों ने उन पर काफी लाठियां बरसाई थी और उन्हें प्रदेश की अलग अलग जेलों में डाल दिया था, लेकिन गोरों के जुल्म-ओ-सितम से यहां के स्वतंत्रता संग्राम सेनानी तनिक भी विचलित नहीं हुए थे। अमर उजाला टीम को गांव की सबसे बुजुर्ग 105 वर्षीय श्यामा देवी मिल गईं। स्वतंत्रता सेनानी स्व. रामस्वरूप के पुत्र यशपाल सिंह की वह सास हैं। याद दाश्त पर जोर देते हुए बताया कि रामस्वरूप अपने कार्यकाल में स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के मंडल कमांडर थे। एक बार ब्रिटिश सैनिकों ने उन्हें गांव में ही बम बनाते उन्हें हुए रंगे हाथों पकड़ लिया था। सजा के तौर पर उनके नाखून में बांस की कीलें ठोंकी गई थी। उन्हें लखनऊ, सीतापुर, बरेली और पीलीभीत समेत कई जेलों में रखा गया। गांव के अन्य 22 सेनानियों में कुछ डाक बांटते थे। कुछ कारतूस बनाते थे, जबकि कुछ शस्त्र बनाते और कुछ योजनाएं बनाते थे। नगर के मोहल्ला बख्तावरलाल निवासी स्वतंत्रता संग्राम सेनानी राजा बहादुर सक्सेना पूरे जिले के सेनानियों को डाक बांटने का कार्य करते थे।