फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

बढ़ रहा गन्ने का रकबा, बाघ बना रहे आशियाना

विज्ञापन
गन्ने की खड़ी फसल। संवाद - फोटो : PILIBHIT
विज्ञापन
पीलीभीत। आजकल बाघ जंगल से बाहर निकलकर आबादी क्षेत्र या गन्ने के खेतों में देखे जा रहे हैं। विशेषज्ञों के मुताबिक इसका अहम कारण जंगल से सटे इलाकों में गन्ने की खेती का बढ़ता दायरा है। बाघ गन्ने के खेतों में जंगल जैसा वातावरण महसूस करते हैं, इसलिए उनकी चहलकदमी आए दिन देखी जा रही है। इसकी रोकथाम के लिए विभागीय प्रयास के साथ ग्रामीणों का जागरूक होना जरूरी है। इसके लिए गन्ने की खेती में कुछ बदलाव भी अहम बताया जा रहा है।
विज्ञापन

पीलीभी टाइगर रिजर्व (पीटीआर) बाघों की मौजूदगी को लेकर पूरे देश में अपनी अलग पहचान बनाए हुए हैं। वर्ष 2020 में एनटीसीए की आई रिपोर्ट में पीलीभीत में पाए जाने वालों बाघों की संख्या 65 बताई गई। संख्या बढ़ना अच्छा है। लेकिन जंगल से बाहर बाघों की सक्रियता ने चुनौती भी बढ़ा दी। खेतों की ओर बाघों का देखा जाना किसानों व ग्रामीणों के लिए दहशत की वजह से है। अमरिया क्षेत्र में सर्वाधिक समस्या रही। फिलहाल परवीन नदी क्षेत्र में डेरा जमाए बाघ भगतनिया, पचपेड़ा, सूरजपुर आदि इलाकों में चहलकमदी करता देखा जा रहा है। एक दर्जन से अधिक मवेशियों का भी शिकार कर चुका है।
तराई टाइगर प्रोजेक्ट के हेड अनिल कुमार का कहना है कि बाघ के बाहर आने के वैसे कई कारण होते हैं। स्थिति को सामान्य रखने लिए इंसानों का जागरूक होना जरूरी है। बाघ या किसी जानवरों से घबराने की नहीं, बल्कि जागरूक होकर बचाव करने की जरूरत है। बाघ समेत अन्य वन्यजीव बहुत कम परिस्थितियों में ही इंसानों पर हमलावर होते हैं। दबाव महसूस करने पर जानवर खुद के बचाव की नीयत से हमला करता है, मारने की नीयत से नहीं। ग्रामीणों को बाघ, तेंदुओं की मौजूदगी देखे तो जागरूक होकर वहां से हट जाएं, विभाग को सूचना देकर निगरानी में सहयोग करना जरूरी है। कई बार ऐसा देखा जाता है कि खेतों में चहलकदमी करते समय बाघ और इंसान का आमना सामना हो जाता है, लेकिन पर्याप्त दूरी होने से बाघ वहां से हट जाता है।
विज्ञापन

गन्ने की खेती में बदलाव पर चल रहा मंथन
तराई टाइगर प्रोजेक्ट के हेड अनिल कुमार ने बताया कि गन्ना का रकबा बढ़ने के साथ फसल घनी उगाई जा रही है। इससे बाघ आसानी से छिप जाता है। इसके लिए पूर्व में शुगर केन इंस्टीट्यूटी रिसर्च इंस्टीट्यूट लखनऊ का दौरा कर जानकारी जुटाई गई। गन्ने की पैदावार में बदलाव करने पर मंथन किया गया। खेतों में पांच से सात फुट की दूरी (गैप) पर फसल लगाने से जानवर गन्ने में नहीं रुक सकेगा। निगरानी भी आसानी से हो सकेगी। इससे पैदावार में पांच प्रतिशत का अंतर तो जरूर पड़ेेगा, लेकिन गैप वाले स्थान पर सब्जी आदि उगाकर उसे पूरा किया जा सकता है।
बाघ के जंगल से बाहर आने के अहम कारण
- अस्वस्थ या कमजोर बाघ शिकार की तलाश में।
- गर्भवती होने पर मादा बाघ सुरक्षित स्थान की तलाश में।
- जन्म के बाद शावक भी अपना जगह तलाश कर निकलते हैं।
- जंगल में इंसानों की दखलंदाजी बढ़ना।
बाघ हमेशा गन्ने की फसल में रुकता है, वह कभी भी गेहूं या अन्य फसलों में नहीं रुकेगा। गन्ने के खेत में उसे जंगल के वातावरण का एहसास होता है। -अनिल कुमार, हेड तराई टाइगर प्रोजेक्ट
बाघों की संख्या बढ़ रही है, जिस कारण वह अपना दायरा बढ़ा रहे हैं। कई कारणों से बाघ जंगल से निकलकर गन्ने की फसल की आड़ ले लेते हैं। अगर हम चाहते हैं कि बाघ जंगल से बाहर न आएं तो हमें जंगल के आसपास ग्रासलैंड विकसित करने होंगे। ताकि जंगल में बाघ को शिकार में आसानी हो। जलाशयों की संख्या में भी इजाफा करना होगा। पानी की तलाश में भी बाघ कई बार जंगल से बाहर आ जाते हैं। हालांकि बाद में वह जंगल में लौट जाते हैं। - विपुल मौर्य, वन्यजीव विशेषज्ञ, भारतीय वन्यजीव संस्थान

अनिल कुमार, हेड तराई टाइगर प्रोजेक्ट।- फोटो : PILIBHIT

विज्ञापन
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें