फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

पर्यटकों को लुभाने में नाकाम साबित हो रहा है टाईगर रिजर्व

Thu, 25 May 2017 10:52 PM IST
ब्यूरो /पीलीभीत
विज्ञापन
पर्यटकों को लुभाने में नाकाम साबित हो रहा है टाईगर रिजर्व
विज्ञापन
लंबा समय बीतने के बाद भी टाइगर रिजर्व प्रशासन अपने द्वारा विकसित किए गए पिकनिक स्पॉटों की ओर पर्यटकों को लुभाने में नाकाम ही साबित रहा। चूका बीच और सप्त सरोवर को विकसित करने के नाम पर महज औपचारिकताएं ही निभाई गई। कुल मिलाकर देखा जाए तो जो स्थिति टाइगर रिजर्व बनने से पूर्व इन स्पाटों की थी वह आज भी है। टाइगर रिजर्व बनने के बाद से ही अधिक खर्च के बावजूद पर्यटक को चूका बीच तक पहुंचकर संतोष करना पड़ता है। टाइगर रिजर्व बनने से पूर्व वन विभाग ने इको-टूरिज्म चूका बीच के अलावा इस इलाके को विकसित करने का प्रयास किए। इसलिए बराही के जंगल में स्थित वर्ष 1926 में बनी सात झाल जिसे सप्त सरोवर का नाम दिया गया। उस समय यहां वीके सिंह प्रभागीय वनाधिकारी थे, जो संयोग से इन दिनों वन संरक्षक बरेली वृत हैं। उन्होंने खीरी ब्रांच नहर से सप्त सरोवर तक एक छोटी माइनर खुदवाकर सप्त सरोवर को विकसित कराने का प्लान बनाया था, ताकि सात झाल झरने के रूप में पर्यटकों का आकर्षित कर सके, लेकिन उनके स्थानांतरण के बाद मामला ठंडे बस्ते में चला गया। इसके बाद तत्कालीन डीएम रितु माहेश्वरी की दिलचस्पी भी बढ़ी तो उन्होंने हट आदि बनाने को बजट भी दिया। लकड़ी की एक हट और एक गोल बंगला बनाया गया, लेकिन यह सब पर्यटकों को अपनी ओर खींचने में नाकाम रहा। वन विभाग भी मात्र प्रशासन से कुछ धनराशि लेकर सौर ऊर्जा से लाइटें लगवाने तक ही सीमित होकर रहा। इधर तत्कालीन डीएम मासूम अली सरवर ने इसको विकसित करने के प्रयास किए। उन्होंने डीएफओ कैलाश प्रकाश के साथ जंगल क्षेत्र का दौराकर सप्त सरोवर को विकसित करने का प्रोजेक्ट बनाकर भेजने को कहा। जिसके बाद सात झाल की रंगाई पुताई की औपचारिकताएं निभाई गई। स्थिति यह रही कि सप्त सरोवर में टाइगर रिजर्व प्रशासन अभी तक ऐसा कोई कार्य नहीं कर सका जो पर्यटकों को चूका बीच के अलावा दूसरे स्पॉट पर लुभाने में मददगार हो सके। वहीं चूका बीच की भी स्थिति यह रही कि एक तो निजी वाहनों का किराया टाइगर रिजर्व बनते ही बढ़ा दिया गया था, दूसरी ओर चूका प्रवेश द्वार से निजी वाहनों के जंगल घूमने पर पाबंदी लगा दी गई। जिन वाहनों को वन विभाग ने अपनी ओर से लगाया उनका किराया ऐसा कि मध्यम वर्ग  के पर्यटकों की कमर टूटने लगी। वन विभाग पूरे वर्ष जंगल सफारी के नाम पर पर्यटकों को घुमाने की बात करता रहा, अब जब जंगल बंद होने में मात्र एक माह का समय शेष बचा है, तो कुछ वाहन उपलब्ध कराए गए, लेकिन इन वाहनों का बढ़ा किराया धनवान पर्यटकों के लिए ही लाभ पहुंचा पाएगा। इसी क्रम में यहां गैंडा परियोजना लागू करने की बात कही गई, लेकिन वह भी अन्य प्रोजेक्टों की तरह कागजों में ही सिमटती जा रही है। कुल मिलाकर देखा जाए तो चूका बीच में जो कार्य टाइगर रिजर्व से पूर्व हुए थे, वही आज भी है। ऐसे में यहां पर्यटकों को रिझाने के लिए किसी बड़े प्रोजेक्ट कर दरकार है।
विज्ञापन
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें