पीलीभीत। कड़े सरकारी मानकों के कारण किसान सीधे आढ़तियों को गेहूं बेचने को विवश हैं। स्थिति यह है कि केंद्रों पर गेहूं न बिकने पर वह तुरंत आढ़तियों के पास पहुंच जाते हैं। मंडी में बाकायदा नीलामी के बाद उनके गेहूं का दाम तय होता है। जो सरकारी मूल्य 2125 प्रति क्विंटल से 100 से 200 रुपये कम होता है। नकद रुपये की आस में किसान कम दाम में ही गेहूं बेच देते हैं।
बारिश व ओलावृष्टि से बर्बाद फसल को लेकर चिंतित किसान किसी भी तरह से फसल को बेचना चाह रहे हैं। ऐसे में सरकार का भाव पाना उनके लिए टेढ़ी खीर साबित हो रहा है। ऐसे में सत्यापन, पंजीकरण, मानक के झोल से बचने के लिए किसान कम दामों पर अपना गेहूं मंडी लाकर बेचने पहुंच रहे हैं। मंडी में आने वाले गेहूं को उन्हीं की आंखों के सामने मंडी प्रशासन नीलाम करवाता है। मौके पर ही मंडी प्रशासन के लोग व व्यापारी नमी का आकलन कर बोली लगाते हैं। ऐसे में किसानों का गेहूं उनके ही सामने 2000 से 2050 तक नीलाम हो रहा है।
कड़े मानक आते हैं आड़े
शासन ने सरकारी केंद्रों पर गेहूं खरीद के कई मानक तय किए हैं। इसमें पंजीकरण, सत्यापन के अलावा नमी का भी मानक है। इन मानकों को पूरा न करने पर ही मंडी में आने वाले किसानों की उपज को नीलाम कराया जा सकता है। मंडी सचिव गेहूं को देखकर न्यूनतम दाम तय करते हैं। फिर इसके आगे की बोली लगती है। इसमें किसानों को सरकार के भाव से 100-200 रुपये कम मिलते हैं।