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सूर्या, मणिकांत, चमनडास आते तो और बढ़ जाती टाइगर रिजर्व की रौनक, तीन वर्षों से हो रहा इंतजार

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शारदा पार उत्पात मचाता नेपाली हाथी। फाइल फोटो - फोटो : PILIBHIT
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फखरूल इस्लाम
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पीलीभीत। तमाम कोशिशों के बाद भी कर्नाटक से आने वाले सूर्या, मणिकांत, चमनडास समेत चार हाथियों की तीन साल बाद भी आमद नहीं हो सकी है। हाथी अगर पीलीभीत आते तो जंगल की रौनक में चार चांद लग जाते। बेहतर गश्त के साथ जंगल से बाहर घूम रहे बाघों पर नजर रखने में भी विभाग को मदद मिलती। फिलहाल अफसरों का दावा है कि प्रक्रिया पर अमल हो रहा है, जल्द ही हाथियों को यहां लाया जाएगा।
पीलीभीत के जंगल में बाघ, तेंदुए के अलावा अन्य वन्यजीवों की संख्या काफी बेहतर है। जंगल और उससे बाहर के इलाके में बाघ की मौजूदगी भी लगातार बढ़ती जा रही है। इससे वन्यजीवों के साथ इंसानों की सुरक्षा भी जिम्मेदारों के लिए चुनौती बनी हुई है। कई बार आबादी क्षेत्र में बाघ की मौजूदगी के चलते मानव वन्यजीव संघर्ष की भी स्थिति बन जाती है।
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हाथी न होने से बाघ की निगरानी करने में विभागीय कर्मचारियों को कई प्रकार की परेशानी का सामना करना पड़ता है। इसके साथ ही बाघ, तेंदुओं की मौतें भी हुई। इस सबकों ध्यान में रखते हुए वर्ष 2020 में टाइगर रिजर्व प्रशासन ने हाथियों की डिमांड शुरू की थी। तीन साल बीतने के बाद बजट मिलने के बाद भी हाथी पीलीभीत के जंगलों में नहीं लाए जा सके।
हाथियों को लाने में कब, क्या हुआ
पीटीआर (पीलीभीत टाइगर रिजर्व) की सुरक्षा और संसाधनों को मजबूती देने के उद्देश्य ये वर्ष 2020 में पीटीआर प्रशासन ने हाथियों की डिमांड के लिए शासन स्तर पर पत्राचार किए थे। वर्ष 2021 के अंत में शासन ने प्रस्ताव को मंजूरी देकर करीब 54 लाख रुपये का बजट आवंटित कर दिया। प्रदेश के साथ केंद्र सरकार की मंजूरी मिलने के बाद अफसरों के दल ने कर्नाटक पहुंचकर हाथियों की स्थिति को परखने के साथ चिह्नीकरण किया था। टेंडर प्रक्रिया पूरी होने के बाद 23 मई, 2022 को दुधवा के चार महावत कर्नाटक भेजा गया था। पीटीआर की माला रेंज में हाथियों को ठहरने के लिए इंतजाम भी किए जाने लगे थे, लेकिन हाथी नहीं आ सके।
रेस्क्यू के लिए दुधवा से लाए जाते हैं हाथी
पीटीआर में बाघों की संख्या बढ़ने के बाद हालत भी बिगड़ेे। पूर्व वर्षों में जंगल से बाहर मानव वन्यजीव संघर्ष की स्थिति बनी। स्थिति को सामान्य रखने के लिए कई बार बाघों का रेस्क्यू करने के भी निर्णय लिए गए, लेकिन हाथी उपलब्ध न होने से विभाग मायूस भी हुआ। परमीशन होने पर कई दिनों के इंतजार के बाद दुधवा से हाथी आने पर बाघ को रेस्क्यू करने का अभियान शुरू किया गया।
कारिडोर नष्ट होने से नेपाली हाथी मचाने लगे उत्पात
दशकों पूर्व से नेपाल से आ रहे हाथी भी नाराज होने लगे हैं। दरअसल बराही रेंज के शारदा नदी पार दशकों पूर्व विशाल जंगल नेपाल सीमा तक फैला हुआ था। लेकिन समय के साथ विभाग के लापरवाह रवैये से जंगल का उजाड़ना शुरू कर दिया। वर्तमान में शारदा नदी के पार केवल लग्गा भग्गा का जंगल शेष बचा है। बाकी जंगल की जमीन पर खेती हो रही है। कॉरिडोर नष्ट होने से हाथी फसलों और झोपड़ियों को उजाड़ने लगे हैं। नतीजतन तीन साल पूर्व रास्ता भटककर एक हाथी ने जनपद सीमा से होकर रामपुर तक उत्पात मचाया था।
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हाथियों को लाने की प्रक्रिया वन निगम को सौंपी गई है। जिस पर अमल किया जा रहा है। उम्मीद है कि जल्द कवायद पूरी होगी। हाथी टाइगर रिजर्व की शोभा बढ़ाएंगे। -नवीन खंडेलवाल, डिप्टी डायरेक्टर, पीलीभीत टाइगर रिजर्व

पीलीभीत टाइगर रिजर्व का मुख्य द्वार। संवाद- फोटो : PILIBHIT

 

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