न्यूरिया के भरतपुर बंगाली कॉलोनी में बांग्लादेशी युवक की धरपकड़ के बाद एक बार फिर बार्डर से लेकर स्थानीय स्तर तक सुरक्षा बंदोबस्त पर सवाल खड़े हो गए हैं। सत्यापन प्रक्रिया पर भी प्रश्नचिन्ह लग गया है। पुलिस के अनुसार हत्थे चढ़ा बांग्लादेशी सजल ओझा पांच साल पहले अवैध रूप से बार्डर पार कर भारत की सीमा में आ गया था। इसके बाद न्यूरिया में अपने चाचा समर ओझा के मकान में रहने लगा। क्षेत्र और पड़ोसी राज्य उत्तराखंड में रहकर वह राजमिस्त्री का काम करता था। सजल के पास से भारतीय नागरिकता का पासपोर्ट, आधार कार्ड, पैन कार्ड आदि दस्तावेज मिलने पर कईयों की गर्दन फंसती दिखाई दे रही है। अगर यह दस्तावेज बनवाए गए तो आसानी से कैसे? फर्जी दस्तावेज के बनवाने के पीछे उसका मकसद क्या था? यदि उसके पास मिले पासपोर्ट समेत अन्य दस्तावेज असली हैं तो इन्हें बनाने वाले कौन-कौन जिम्मेदार हैं? पासपोर्ट बनवाने के लिए कई तरीके की जांचों से गुजरना पड़ता है। पासपोर्ट कार्यालय से एक प्रति जिला प्रशासन को भी आती है। इसकी एलआईयू व पुलिस उसके करेक्टर से लेकर अन्य जांच गहनता से करने के बाद ही अपनी रिपोर्ट देती है। रिपोर्ट में सब कुछ ओके होने के बाद ही पासपोर्ट कार्यालय से पासपोर्ट जारी होता है। हालांकि पुलिस फिलहाल इन सभी दस्तावेजों को फर्जीवाड़ा कर बनाने की बात कह अपनी गर्दन बचा रही है, लेकिन एक बांग्लादेशी के पांच साल से यहां रहने और चार बार उसके बांग्लादेश जाकर लौट आने के उजागर हुए मामले ने पुलिस व खुफिया एजेंसियों की कार्यप्रणाली पर सवालिया निशान लगा दिया है। इससे पहले भी बांग्लादेशी युवक न्यूरिया में पकड़े जा चुके है। वह भी आर्थिक स्थिति कमजोर होने पर मजदूरी के लिए अवैध तरीके से बार्डर पार कर आए थे। उसी तरह सजल भी, बताते हैं कि यहां रहने के दौरान चार बार बांग्लादेश गया और वापस लौटा। पांच साल से रहने के बाद अब उसकी जानकारी पुलिस को लग सकी। उसके यहां पर कुछ जमीन खरीदने की बात भी सामने आ रही है। पुलिस पूरे मामले में जांच के बाद सख्त कार्रवाई की बात कह रही है।