समय से पहुंचती एंबुलेंस तो बच जाती जान
परिवार वालों का आरोप है कि जब उन्होंने एंबुलेंस को फोन किया तो नंबर ही नहीं लगा। इसके बाद जब नंबर लगा तो कम से कम डेढ़ घंटे के बाद एंबुलेंस पहुंची। अगर समय से वाहन मिल जाता तो पिता-पुत्र जान बच जाती।
स्कूल चला गया होता विशाल तो बच जाती जान
जिला अस्पताल में बेटे और पति के खोने का दर्द सुधा की भीगी आंखें बयां कर रही थीं। वह रो-रोकर सिर्फ इतना ही कह रही थी कि दोनों में से भगवान किसी एक को तो उसके पास छोड़ देता। उसका बेटा सुबह बारिश होने की वजह से स्कूल नहीं जा पाया। अगर वो स्कूल चला गया होता तो उसकी जान बच जाती।
विशाल शहर के एक कॉलेज से आईटीआई कर रहा था। मृतक की पत्नी के पास जीने के लिए सिर्फ चार साल का बेटा धैर्य और उसकी पुत्री सृष्टि ही रह गई है। परिवार की आर्थिक स्थिति भी बेहद खराब है। पति परचून की दुकान चलाकर जैसे तैसे परिवार का भरण पोषण करता था। पति की मौत के बाद घर चलाना भी किसी चुनौती से कम नहीं।